Friday, 25 June 2010

भोपाल गैस त्रासदी : क्या अमेरिका से डर गया भारत?

भोपाल गैस त्रासदी : क्या अमेरिका से डर गया भारत?

माना कि कांग्रेस सरकार १५००० करोड़ का मुआवजा दे कर भोपाल गैस त्रासदी से पीड़ित लोगों का भला कर रही है.. पर क्या सिर्फ रुपये दे कर उन लोगों का दुःख बांटा जा सकता है जो आज तक एंडरसन के किये कि सजा भुगत रहे हैं?
मेरी मानो तो कभी नहीं... क्योंकि २६ साल होने को आये हैं और आज तक किसी ने भी ये जानना नहीं चाहा कि आखिर एंडरसन रातों रात कैसे गायब हो गया, अगर आज हमारी मीडिया नहीं होती तो ये मुमकिन भी न होता कभी, आज भोपाल कि जानता के लिए सिर्फ एंडरसन ही नहीं बल्कि वो सभी लोग दोषी हैं जिन्होंने एंडरसन को भागने में मदद की. और आखिर क्यों की गई उसकी मदद, क्या अमेरिका से डर गया भारत? अगर ऐसा था तो आज हमको "मेरा भारत महान" के नारे लगाने पर भी शर्म आनी चाहिए... "मेरा भारत महान" इतना महान कि वो अपने गुनाहगार से डर गया, उससे डर गया जिसने भारत माँ के सीने में गोली चलने जैसा घिनौना अपराध किया है...
आज २५ साल हो गए इस गैस त्रासदी को, जिसके बारे में सारी दुनिया को पता है, पर आज तक भुगत तो सिर्फ भोपाल कि आम जनता रही है... क्या होता अगर उस वक़्त भारत अमेरिका के दबाव में न आता, क्या उस वक़्त रूस हमारा साथ न देता? रूस जैसे देश ने हर कदम पे हमारा साथ निभाया है तो क्या तब भी वो कोई साथ न निभाता? वो जरूर हमारा साथ निभाता... पर भारत ने कभी भी अपने दोस्तों पे विश्वास नहीं किया, और अगर कुछ किया है तो बस अमेरिका और चीन जैसे खुदगर्जों की अगुवाई... अगर भारत के दिग्गज नेताओं ने उस वक्त कोई ठोस कदम उठाया होता तो आज ये नौबत न आती. और भोपाल आज चैन की सांस ले रहा होता, यूँ Methyl Isocyanate के धुएं में घुट घुट के न जी रहा होता... न जाने भोपाल को इन्साफ कब मिलेगा...
इस बात पे मैं बस इतना ही कहना चाहता हूँ बस...

जिसने कभी मेरा साथ न दिया, आज वो ही मुझे भा रहा है...
ये मेरी अच्छाई है या उसका डॉलर मुझे, आज अपनों के जख्मों से ज्यादा भा रहा है?

शायद मैं डर गया उसकी सैन्य ताकत देख कर...
या ये कहूं, मैं तो बस फिसल गया हरे हरे नोटों की चमक देख कर...

भूल गया मैं धन दौलत की चकाचौंध को देख कर, के वो जो मेरा गुनाहगार है वो मुझसे ही मेरा गुनाह छिपा रहा है.
मेरा और मेरे अपनों का गम तो गया आज तेल लेने, क्योंकि वो आज मुझे डॉलर के साथ आँखें भी दिखा रहा है...

भूल गया मैं उस ज़ज्बे को जिसके तहत पायी थी मैंने कभी आजादी,
आज तो मुझे भारत माता का रोना भी कहाँ याद आ रहा है...

हर किसी ने लूटा मेरी प्यारी भारत माँ को हरदम,
फिर भी मेरा दिल आज भी "मेरा भारत महान" के नारे गर्व से गा रहा है...

जिसने कभी मेरा साथ न दिया, आज वो ही मुझे भा रहा है...
ये मेरी अच्छाई है या उसका डॉलर मुझे, आज अपनों के जख्मों से ज्यादा भा रहा है?

लेखक और कवि -
महेश बारमाटे
25th June 2010