Monday, 25 October 2010

बेवफा

बेवफा 

      "एकता, जो कल तक तक आकाश के साथ अक्सर दिखाई देती थी, आज वह बिल्कुल अकेली और उदास नज़र आती है. कारण भी तो बहुत ख़ास और दुखद है, कुछ दिनों पहले आकाश की  एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी... भरी जवानी में बेचारे की मौत का सदमा बर्दाश्त करना एकता के बस में ना था.. एकता और आकाश एक दूसरे को दिलो-जाँ से चाहते थे.. प्यार की हद तक दोनों ने एक दुसरे को चाहा, साथ जीने मरने की कसमें तक खाईं दोनों ने, पर होनी को कौन टाल सकता है... 

                     वो चला गया मुझको यूँ तन्हा छोड़ कर 
                      के क्या होगा अब मेरा बस उसके बगैर...
                                      मेरी जिंदगी का हर लम्हा उसके प्यार में था जी रहा,
                                      अब क्या क्या मिलेगा मुझे, यूँ तन्हा जी कर...

       शायद कुछ ऐसा ही कह रही थी अब एकता की आँखें... आज एकता पूरी तरह से टूट चुकी थी, के जैसे किसी फूलदार डाली के सारे फूल हवा के किसी तेज झोंके ने बिखेर दिए (तोड़ दिए) हों.. 

       कल तक एकता को अपने आकाश पर बहुत नाज़ था, और क्यों ना हो क्योंकि आकाश था भी इसका हकदार... अगर कोई लड़की एक आदर्श प्रेमी की चाहत करे तो आकाश का नाम सबसे ऊपर गिना जायेगा... और इसी कारण एकता - आकाश की जोड़ी भी आदर्श जोड़ी कही जाती थी पूरे कॉलेज में... पर ये समय न कभी किसी का हुआ है और न ही कभी किसी का होगा...", - कुछ ऐसा ही फ़साना बयाँ कर रही थी आज अनीता की आँखें मयूर से.

        मयूर, अनीता का Best Friend है और अनीता, एकता की Best Friend.. एकता एक 19 साल की सुन्दर लड़की थी... कमर तक आते उसके बाल, सुन्दर कद - काठी, देखते ही सब का मन मोह ले... इधर अनीता भी दिखने में बिल्कुल एकता की ही तरह, पर थोड़ी मोटी पर सुन्दर लड़की थी... और मयूर सीधा साधा, दुबला पतला, सांवला सा, पर उच्च विचारों वाला लड़का था...

         आज अनीता और मयूर, एकता को जब भी देखते तो उनका मन भी उसके दुःख में रो पड़ते थे. मयूर, जो दिल ही दिल में एकता को पसंद करता था, से एकता का दर्द नहीं सहा जाता था... वो चाहता था की एकता की जिंदगी में फिर से रंग भरने चाहिए पर कैसे वो ये नहीं जानता था... वो ये बात उससे कहना चाहता था  पर कभी कह न सका, क्योंकि उसके मन में एक शंका थी कि "वो एक खुद्दार लड़का है, और ये बात एकता भी अच्छी तरह से जानती है, तो कहीं अगर उसने एकता या अनीता से इस बारे में बोला तो वो ये ना सोचे कि मयूर उस पर बस दया कर रहा है..." बस इसी शंका के कारण वो कभी एकता से अपने प्यार का इज़हार न कर सका.. मयूर, एकता को किसी और की बाहों में तो देख सकता था, पर कभी उसे किसी गलत इंसान की बाहों में नहीं देख सकता था... और न ही वो उसे खुद को ठुकराते हुए देख सकता था, इसी कारण वो हमेशा ही चुप रहा... बस वो इतना चाहता था की एकता की जिंदगी फिर से रंगीन हो जाए और कोई आकाश की ही तरह का लड़का फिर उसकी जिंदगी में आ जाए, ताकि उसे आकाश की कमी कभी महसूस ही न हो...

बस इसी इंतज़ार में पूरा एक साल गुजर गया...

         रंजीत जो कि दिखने में Handsome और Nature wise बहुत ही अच्छा लड़का था, पर उसमे बहुत सी खामियां भी थी, जैसे कि Cigarette, शराब इत्यादि, वो भी एकता को पसंद करता था... उसकी बुरी आदतों के बारे में एकता क्या सारे कॉलेज को पता था.  और एक दिन कॉलेज के 2nd year ख़त्म होने के कुछ दिन पहले, रंजीत ने एकता से अपने प्यार का इज़हार कर दिया...
          ये वही दिन था जिस दिन "आकाश" की मौत को पूरा एक साल हो गया था... इससे भी बड़ी आश्चर्य की बात तो तब हुई जब एकता ने सब कुछ जानते हुए भी रंजीत को "हाँ" कह दिया... और उसी दिन एकता और रंजीत दोनों अपने प्यार का जश्न मनाने long drive पर गए... 
          ये बात तब मयूर को पता ही न थी, पर जब पता चला तो उसे बिल्कुल विश्वास भी ना हुआ.. यूँ ही कॉलेज का 2nd year भी गुजर गया... मयूर, एकता का रंजीत को "हाँ" कहना सह ना सका, सारी गर्मी कि छुट्टियाँ उन्ही दोनों के बारे में सोचता रहा... आखिर गर्मी की छुट्टियाँ जब ख़त्म हुईं, तब सभी दोस्त एक बार फिर कॉलेज में मिले... तब एक दिन दोस्तों कि महफ़िल में मयूर के मुँह से निकल ही गया - "आखिर वही हुआ जो मैंने सुना था पर कभी विश्वास ही ना किया, कि लड़कियाँ कभी किसी का इंतज़ार नहीं करतीं और एकता ने भी वही किया.."
         इस पर अनीता ने गुस्से में मयूर से कहा, "तो क्या हुआ मयूर ? आखिर कब तक वो उसका इंतज़ार करती जो कभी लौट के आ ही नहीं सकता ?" 
        तब मयूर ने कहा, "मैंने कब कहा कि वो इंतज़ार करे, पर जो भी करे कम से कम सही तो करे, मैं ये नहीं कहता कि उसने कुछ गलत किया, पर कुछ सही भी नहीं किया उसने..."
        अनीता - "तो तुम्हारी नज़र में क्या सही है ?"
        मयूर - "उसने कुछ गलत नहीं किया, पर उसका चुनाव गलत था."
        अनीता - "OK मयूर, तो तुमको क्या लगता है कि वो तुमको चुनती ?" 
       मयूर (हँसते हुए) - "अपनी ऐसी किस्मत कहाँ ? अरे हम तो बस वो हैं जिसे किसी ने देखा ही नहीं और जिसने देखा उसने पहचाना ही नहीं..."
        इस पर सारे दोस्त हंस पड़े.
        थोड़ी देर बाद अनीता ने फिर मयूर से कहा, "देखो मयूर, लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं. कोई किसी का इंतज़ार नहीं करती... क्योंकि तुमको भी पता है कि एकता को सहारे कि जरूरत थी, अब जब रंजीत ने आगे बढ़कर उसे सहारा दिया तो तुम एकता को गलत क्यों कह रहे हो ?"
        तब मयूर ने कुछ न कहा, और चुपचाप सुनता रहा... तभी Claas room में कोई Teacher आ गए, और उनकी महफ़िल यूँ ही ख़त्म हो गई... पर उस दिन घर जाने से पहले अनीता ने मयूर से फिर पुछा, "तुमने कोई जवाब क्यों नहीं दिया ?", तब मयूर बोला, "इसका जवाब मैं कॉलेज के last में दूँगा, I mean आखिरी exam के दिन..." ये कह कर वो वहाँ से चल दिया... 

          यूँ ही कॉलेज का ये साल भी गुजर गया पर मयूर ने आखिरी exam के दिन भी अनीता से कुछ न कहा... उसे याद था पर वो कह न सका... उसने अनीता के पूछने पर बस इतना ही कहा, "अनीता, मेरी ये बात हमेशा याद रखना कि मैं नहीं जानता कि एकता कैसी लड़की है, पर मैं बस इतना जनता हूँ कि जो आकाश की ना हो सकी वो किसी की नहीं हो सकती". ये बात पहले तो अनीता की समझ में न आई और वो सोचती रही की मयूर उससे क्या कह गया.. और उसने वो मयूर से इस पर कुछ बोलना चाहा तो उसने देखा कि मयूर वहाँ से जा चूका है...

          अब कॉलेज बंद हो चुके थे... करीब एक महीने बाद, रंजीत ने, जो कि एकता के प्यार में पूरी तरह से सुधर चूका था और अपनी सारी बुरी आदतें छोड़ चूका था, अनीता को call किया और उसे बताया कि एकता ने उसे किसी दुसरे लड़के के लिए छोड़ दिया... शुरू में तो अनीता को भी विश्वास न हुआ, पर बाद में जब उसे सच्चाई पता चली तो उसे मयूर की वही बात याद आई जो उसने उससे कॉलेज के आखिरी दिन कही थी... और मयूर के द्वारा कही गयी एक कविता भी याद आई उसे, जिसके बोल थे - 

मैंने तुमको क्या समझा और क्या निकले तुम ?
दुनिया ने माँगी थी तुमसे वफ़ा, पर बेवफा निकले तुम...

किसी ने प्यार में दे दी तुम्हारे जाँ,
और उससे सच्चा प्यार भी ना कर सके तुम...
किसी ने बदल के खुद को हो गया तुम पर कुर्बान,
और किसी पे एतबार भी ना कर सके तुम...

मैंने तुमको क्या समझा, और क्या निकले तुम ?
जिसने की तुमसे वफ़ा, बस उसी के लिए बेवफा निकले तुम...


- महेश बारमाटे
   8 Oct 2007