Tuesday, 22 February 2011

निराशा... आखिर कब तक ?

       "घुट घुट कर जीने से अच्छा है कि मर जाओ..." ये वाक्य अक्सर हम सभी ने कहीं न कहीं सुनी या पढ़ी या शायद कही भी होगी, पर अगर घुट - घुट कर जीना आपको रास नहीं आ रहा है तो क्या मर जाना ही ठीक होगा ? 
      अगर सच में इस बात पर दिल और दिमाग दोनों से शांति पूर्वक सोचा जाए तो एक ही जवाब मिलेगा और वो है - "नहीं"... क्योंकि कोई भी इतनी जल्दी और आसानी से मरना ही नहीं चाहता... चींटी भी बार - बार दीवार से गिर - गिर कर भी आखरी में छत तक पहुँच ही जाती है तो फिर एक - दो हार से परेशान हो कर मरने की ठान लेना तो कायरता ही होगी न ? इसलिए आज अगर आप अपनी कुछ हारों से तंग आ कर कुछ कर गुजरने, मेरा मतलब है कि मरने कि सोच रहें हैं, तो मरने से पहले कम से कम ये अच्छी तरह जानने कि कोशिश जरूर करें कि आखिर गलती हुई है, तो आखिर कहाँ ? और उसे दूर करने का कोई उपाय है या भी नहीं ? अगर जिस किसी ने ये एक बार भी सोच लिया तो वह मरना भूल जायेगा, मतलब अपने मरने का इरादा छोड़ देगा वह...
       उसी प्रकार अगर आप घुट - घुट कर जीने को मजबूर हैं, तो उस वजह को ढूँढने की कोशिश जरूर करें, जो आपको घुट - घुट कर जीने को मजबूर कर रही है... आखिर वह कौन है या क्या है, जो आपकी इस हालत का ज़िम्मेदार है ? अगर वह कोई व्यक्ति विशेष है तो उस व्यक्ति से ये जानने की कोशिश जरूर करें कि "आखिर वह क्यों इस तरह आपको तड़पा रहा है ?" उसे अपने दिल की बात बताएँ, अगर तब भी वह नहीं मानता, तो ...? तो मरने की कोई जरूरत नहीं और घुट घुट कर जीने की भी कोई जरूरत नहीं क्योंकि आज समय है उस वजह को ख़त्म करने का, उसका प्रतिकार करने का और उस वजह को, व्यक्ति को भुला कर एक नई ज़िन्दगी जीने का...
      आज हमें इस कहावत, "घुट घुट कर जीने से अच्छा है कि मर जाओ..." को बदल कर एक नई कहावत इजाद करनी होगी और तब वह कहावत  इस प्रकार हो सकती है - 
 घुट घुट कर जीने से अच्छा है, 
कि उस वजह को ही मार डालो या ख़त्म कर दो, 

जिसने आपको घुट घुट कर जीने के लिए मजबूर कर दिया है...
        आशा है कि कुछ लोग इस बात को समझ ही गए होंगे...
       और अंत में मैं उन सभी से माफ़ी माँगता हूँ जो मेरी बात से सहमत नहीं हैं, क्योंकि ये तो बस मेरे मन के विचार हैं, इन पे किसी का सहमत होना या न होना मेरे बस में नहीं है...


धन्यवाद...!

आपका
महेश बारमाटे (माही)
7th Dec. 2007