Saturday, 2 April 2011

बदलाव ही ज़िन्दगी है...

        ज़िन्दगी में कभी - कभी हर किसी को अपने स्वाभाव को बदलना पड़ता है. वैसे.., इन्सान का स्वाभाव change हो जाना आम बात है और इसके कई कारण हो सकते हैं. जब किसी का स्वाभाव स्वतः ही change हो जाये, जैसे कि अचानक मिली सफलता या विफलता के कारण. कभी कभी समय के साथ हमारा स्वाभाव भी यूँही बदल जाता है हम इस अचानक आये परिवर्तन को काबू में नहीं रख पाते, शुरू में कोशिशें जरूर करते हैं मगर, किस्मत के आगे किसकी चलती है ? क्योंकि "परिवर्तन ही तो प्रकृति का नियम है".
         ये तो रही बात हमारे स्वाभाव के स्वतः परिवर्तन की, पर अगर जब हम खुद को बदलना मतलब अपने स्वाभाव में जबरदस्ती बदलाव लाना चाहते हैं, तो हम अक्सर खुद पर ज़ुल्म करते हैं या जिसके लिए हम खुद को बदलना चाहते हैं, उन्हें ही चोट पहुँचाने लगते हैं. ये चोट शारीरिक कम मगर मानसिक ज्यादा होती है. जैसे कि अगर हमें किसी को अपनी ओर आकर्षित करना करना होता है तो अचानक ही उससे दूर रहने लगते हैं और उसे avoid करने लगते हैं. अगर जिसे हम avoid कर रहे हैं वो हमारा अच्छा मित्र हो और उसे हम अपने और करीब पाना चाहते हों तो विशेषज्ञों के अनुसार 80 % chances होते हैं कि वह हमारे और करीब आने की कोशिश करने लगता है. ये इसलिए होता है क्योंकि इन्सान की फितरत है कि अगर उसे जिस काम को करने के लिए मना किया जाये, तो वह वो कम जरूर करने कि कम से कम 1 बार कोशिश जरूर करेगा. बस इसी सिद्धांत के कारण अक्सर लोग एक - दूसरे के करीब आ जाते हैं.
          पर ये उपाय हमेशा काम आये ये जरूरी नहीं, क्योंकि कभी - कभी ऐसा नहीं भी होता.पर जब हम खुद को बदलते हैं ताकि हमे देख के कोई अपना भी हमारे लिए खुद को बदलने लगे, तब हम अपनी सोच में बदलाव ला कर अपना स्वाभाव तो बदल लेते हैं, पर जिसके लिए हमने ये बदलाव लाया है वो हमारे इस बदलाव से नहीं बदला और हमारी सोच के विपरीत ही रहा तो हमारी मेहनत धरी की धरी रह जाती है. और तब कहीं हमें ये न कहना पड़ जाए - 
                                              मैं बदल गया तुझे बदलने के लिए,
                                              तुझमे अपनी दोस्ती का रंग भरने के लिए...
                                                       पर जाने किस ग़लतफ़हमी ने तुझमे, ऐसा ज़हर है भर दिया,
                                                        के तू है निकल पड़ा मेरी ही जान लेने के लिए...
        बस इन्ही पंक्तियों को अगर हमें अपने मुख से न निकलना हो, तो हमें अपने अन्दर हमारी ही मर्जी से आये बदलाव को पूरी तरह से स्वीकारना होगा. इस बदलाव को अब ठुकराना बहुत गलती होगी क्योंकि विरोध हर जगह कारगर नहीं होता. अपने अन्दर आए बदलाव का हमेशा स्वागत करें और खासतौर पर उस बदलाव का, जो कभी आपकी अपनी चाहत में शामिल था. और ज़िन्दगी हर कदम बदलती है, इसलिए ज़िन्दगी के (समय के) बदलाव को भी स्वीकारना सीखें. क्योंकि बदलाव ही ज़िन्दगी है, यही समय है, यही प्रकृति है... 

महेश बारमाटे
7th April 2008

0 comments:

Post a Comment