Saturday, 23 March 2013

छूट या लूट ... ?

छूट ... 
छूट ...
छूट ...

इस छूट ने अच्छे - अच्छे सरकारी विभागों को आज लिया है लूट ... 

जी हाँ !
आज सरकार ने अपने ही कई विभागों में छूट का प्रावधान रख के उन विभागों के लिए नर्क के द्वार खोल दिए हैं। बस चंद वोट की खातिर आम जनता को पंगु तथा बेईमान बना रही है आज सरकार। मैं अन्य सरकारी विभागों के बारे में तो ज्यादा नहीं बता सकता मगर मैं जिस विभाग से हूँ उसमे तो सरकार ने तो हद कर के  रखी है। बिजली ... किसी भी देश, प्रदेश की रीढ़ की हड्डी कहलाती है क्योंकि बिन बिजली कोई भी देश विकास नहीं कर सकता, और आज के दौर में तो फसलें भी बिना बिजली के पैदा नहीं होती। और आज हमारे देश में अगर कोई प्रदेश सरकार गिरती है तो मुख्य मुद्दा बिजली का ही होता है। इसी कारण कुछ दिनों पहले हमारे प्रदेश के मुख्य मंत्री जी ने किसानो के बिलों पे सरचार्ज माफ़ कर के ५० % बिल माफ़ करने की घोषणा कर दी, जाने क्या सोचा और घोषणा कर दी। ये भी नहीं सोचा की ये मार्च है, वित्तीय वर्ष का अंतिम महिना। इसमें बिजली बिल माफ़ करने की घोषणा बिना किसी लिखित आदेश के करना बिजली के अधिकारीयों की कमर तोड़ देने के बराबर है। 
उधर उच्चाधिकारी ये चाहते हैं कि गत वर्ष जो बिजली के बिल जमा हुए थे, उससे कई गुना ज्यादा बिल इस बार आना चाहिए। अब जब सीएम साहब ने घोषणा कर ही दी तो क्यों कोई अपना पूरा बिल जमा करेगा ? 
और तो और जो व्यक्ति हर महीने अपना बिल जमा कर रहा है वो भी अब कहता है कि चोरों को रियायत और हमको कुछ भी नहीं ? ये कैसा न्याय है ? 
सच है ये, कि अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी से हर माह अपना बिल भरता आ रहा है तो उसे प्रोत्साहन के तौर पे कोई रियायत नहीं दी जाती, पर अगर कोई व्यक्ति जानबूझ कर या किन्ही कारणों से अपना बिजली का बिल नहीं जमा कर पता तो एक साथ जमा कर ने पर उसे छूट दी जाती है। 
कहते हैं की सुविधाएँ इंसान को नाकारा और पंगु बना देती हैं, और आज ऐसा ही कुछ भविष्य मैं इस देश को बनाने वाले किसानो का भी देख रहा हूँ। 
किसान छूट के चक्कर में बिल नहीं भरता, और नेता लोग ऐसे चोर, कामचोर, बेईमान किसानो को छूट पे छूट दे दे के वोट लिए पड़े हैं पर किसी ने भी ये नहीं सोचा कि इन छूट की योजनाओं से, बेतुकी व बेबुनियादी घोषणाओं से किस का भला कर रहे हैं ? इस देश का या खुद का ?

- इंजी० महेश बारमाटे "माही"