Sunday, 20 September 2015

ये सफ़र, ज़िन्दगी है।

करीब 2 साल बाद.. आज फिर लिख रहा हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे लिखना भूल ही गया था। पर आज जो लिखने वाला हूँ, यक़ीनन आपको जरूर पसंद आएगा।

कुछ दिन पूर्व, मैं कुछ चिंताओं से घिरा हुआ था, सोच रहा था कि आखिर ये बुरे दिन कब जायेंगे। और बस यही सोचता, मैं अपनी बाइक से ऑफिस से घर की ओर आ रहा था। चूँकि बरसात के दिन हैं तो रास्ते बहुत ख़राब हो गए हैं। जगह - जगह पर रोड ख़राब हो गई है, जो सफ़र मैं 15 मिनट में तय करता था आज उसमे 30 मिनट से भी ज्यादा वक़्त लग रहा है। फिर ये रोज का ही रूटीन है मेरा।
ये 15 मिनट या 30 मिनट का रास्ता तय करते करते जब मैं अपनी समस्याओं के बारे में सोच रहा था तभी अचानक ये ख्याल आया कि ज़िन्दगी भी तो कुछ इस्सी रास्ते की तरह ही है। कहीं बिलकुल सीधी और सपाट सड़क, कहीं उबड़ खाबड़ टूटी हुई सड़क, कहीं हद से ज्यादा तीखा मोड़ लिए हुए तो कहीं कुछ और। इस सड़क पे हम हमेशा चलते रहते हैं। अगर टूटी उबड़ खाबड़ सड़क होती है तो संभल कर चलते हैं पल पल में अपनी गति और दिशा बदलते रहते हैं। अगर सड़क सपाट है तो भी तो हम अपनी गति और छोटे मोटे गड्ढों या अवरोधों से खुद को बचाते या सब कुछ इग्नोर करते हुए प्रतिदिन अपनी मंजिल तक पहुँचते हैं।
सफ़र छोटा हो या बड़ा। हम हर दिन एक मंजिल तय करते हैं। रोज ऑफिस जाना या ऑफिस से घर जाना। काम रोज का है मंजिल भी जानी पहचानी है और सड़क भी वही है पर हर रोज उसी सड़क पर एक ही स्पीड से एक ही तरीके से तो नहीं चलता मैं। हर रोज एक नए गड्ढे को इग्नोर करता हूँ कुछ अवरोधों से बचता हूँ। नए मुसाफिरों को देखता हूँ। फिर जा कर वही रोज वाला सफ़र तय करता हूँ।
अब इस सफ़र को ज़िन्दगी मान लूँ तो कुछ अवरोध / गड्ढे जिनसे मैं बचता हूँ वो दुःख हैं, जिनसे खुद को बचाता हूँ। कुछ गड्ढों को इग्नोर करते हुए मैं गाड़ी चलाता जाता हूँ वो ऐसे दुःख हैं जिनको इग्नोर कर देने से सफ़र में ज्यादा दर्द नहीं होता।
और सीधी सपाट रोड में भी तो मैं गाड़ी सीधी एक लकीर में नहीं चला पाता। तो कैसे मान लूँ कि ज़िन्दगी जो बिल्कुल दर्दरहित है वो भी बिना रास्ते से पल दो पल के लिए भटके ही गुजर जायेगी।
इस रोज के सफ़र ने मुझे, ज़िन्दगी का एक पाठ सिखा दिया कि ज़िन्दगी कभी भी सिर्फ सुख भरी नहीं है इसमें दुःख है, मोड़ हैं, रुकावटें हैं। जिन पर से हमें गुजरना है। अब ये बात अलग है कि इन दुखों को इग्नोर करना है, इन से बच के निकलना है, स्पीड मेंटेन कर के चलना है या जो हो रहा है उसे होते रहने देना है और जिस तरह रोड ख़राब होने पर हम शासन को दोष देते हैं उसी तरह जीवन के कुछ पल दुखदायी होने पर भगवान को दोष देना है।
बस हममे सही फैसला लेने का दम होना चाहिए। सफ़र अनजान ही सही, आखिर कट ही जाता है। बिलकुल ज़िन्दगी की तरह।

(पता नहीं क्या क्या लिख डाला मैंने, शायद आप कुछ समझ सकें।)

- महेश बारमाटे "माही"
20 सितम्बर 2015