Sunday, 22 July 2018

सब्जी क्या बनाऊँ : एक राष्ट्रीय समस्या (व्यंग्य)

 हमारे भारत में राष्ट्रीय तौर पर उभर रही है एक समस्या, जिससे समस्त गृहणियाँ और साथ में बेचारे पति भी परेशान रहते हैं, उससे न जाने कितने परिवारों में दिन में न जाने कितनी बार मनमुटाव, लड़ाई झगड़ा और यहाँ तक कि मार पीट की भी नौबत आ जाती है, उस समस्या का नाम है - " सब्जी क्या बनाऊँ?"

जी हाँ! इस समस्या से मेरे हिसाब से लगभग हर पति परेशान हुआ जरूर होगा। वैसे तो ये समस्या केवल गृहणियों की ही है पर इसके साइड इफ़ेक्ट तो सबसे ज्यादा पतियों को ही झेलने पड़ते हैं। और ये समस्या अक्सर शाम के वक़्त ही देखने को मिलती है, क्योंकि हमारे देश के सर्वाधिक पति जब भी काम से घर लौटते हैं, उनसे ये बात जरूर पूछी जाती है, कि सब्जी क्या बनाऊँ? अब ऐसे में बेचारा पति जो ऑफिस से बॉस की खरीखोटी सुन के आया हो, किसी उपभोक्ता से या अपने क्लाइंट से अपनी कंपनी या विभाग की गलत नीतियों को सही साबित करने के चक्कर में ही कुछ जबरदस्त टाइप की बहस कर के आया हो, उसके दिमाग मे अब भी उसी बॉस, क्लाइंट या उपभोक्ता की बातें घूम रही हों, तो भी वो खुद को नॉर्मल सा दिखाने के चक्कर में मन को शांत कर रहा हो, तभी उनकी प्रिय पत्नी जी ने उनके सामने एक सवाल रख दिया हो, "सब्जी क्या बनाऊँ..?" तो घर में तांडव होना जरूरी सा प्रतीत होता है। सच कहूँ, उस समय तो ऐसा लगता है जैसे कंप्यूटर पे जरूरी फ़ाइल ईमेल से डाऊनलोड हो रही हो और किसी ने अचानक से कंप्यूटर का रिसेट बटन दबा दिया हो, फिर तो बेचारे पति देव के दिमाग में कुछ भी नहीं बचता। तब या तो लड़ाई की स्थिति निर्मित हो ही जाती है या फिर पतिदेव अपने कंप्यूटर दिमाग में खोजते हैं कि पिछली दफा जब किचन में घुसे थे तो उन्होंने फ्रिज में क्या क्या सब्जी देखी थी जो बनाई जा सकती है। और इस प्रक्रिया में पतिदेव का कंप्यूटर दिमाग ये गणना करने लगता है कि यार, किचन में घुस कर फ्रिज में देखने का ये सौभाग्य आखिर कब पाया था उन्होंने। क्योंकि हिंदुस्तान में अक्सर पतियों को सदियां गुजर जाती हैं पर किचन के अंदर उनके पद नहीं पड़ते हैं। फिर आनन फानन में उनके मुँह से बस यही निकलता है कि यार! तुमको जो पसंद हो वही बना दो। 

ऐसे में भारतीय पत्नी जो कि अपने पति की सेवा में लगी रहती है वो सोच में पड़ जाती है कि "यार! हमेशा तो अपने ही हिसाब से सब्जी बनाती हूँ, और आज कुछ अलग बनाने का मूड हुआ तो जनाब ने बोल दिया अपने हिसाब से ही देख लो, ये भी तो कह सकते थे कि चल रहने दे आज होटल से खाना खा के आते हैं, पर इनको तो बस मुझसे खाना बनवाना है, काम वाली बाई बना के रख दिया है।"

और फिर क्या, पत्नी जी थोड़ी नासमझ होंगी तो मनमुटाव इत्यादि की स्थिति बनेगी नहीं तो वो अपनी समझदारी का परिचय देते हुए, तुरंत लौकी या टिंडे की सब्जी बना देती है। जिसे खाने का मन, शायद ही किसी पतिदेव को होता होगा। अरे! मैंने तो एक बार फेसबुक में किसी महानुभाव के द्वारा शेयर की गई पेपर की कटिंग में पढ़ा था कि किसी जगह रोज रोज लगातार 7 दिन तक लौकी की सब्जी बनाने के आरोप में पतिदेव ने अपनी पत्नी के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज करवा दी। मेरे ख्याल से उस घर में भी यही समस्या सबसे ज्यादा रही होगी कि सब्जी क्या बनाऊँ..?

खैर! मैं तो थोड़ा खुशकिस्मत हूँ कि ये समस्या मेरे घर पे तो सिर नहीं उठा रही क्योंकि मेरी प्रिय पत्नी जी स्वयं सोच लेती हैं कि आज क्या बनाना है और क्या नहीं..? और ऊपर वाले की कृपा से हर छुट्टी वाले दिन स्वतः ही कुछ स्पेशल खाने का सौभाग्य हमको मिलता रहता है।

वैसे मेरा अपने देश के माननीय प्रशासन से अनुरोध है कि देश की राष्ट्रीय समस्याओं की सूची में "सब्जी क्या बनाऊँ..?" की समस्या को भी शामिल करते हुए संसद में इस सम्बन्ध में वार्तालाप, चिंतन वगैरह कुछ करना चाहिए, और कोई न कोई ठोस हल निकालना जरूर चाहिए, वरना एक दिन ऐसा आएगा कि जो भी पतिदेव मुझ जैसे सौभाग्यशाली नहीं होगा, वो तो भैया, टिंडे और लौकी पर ही अपनी ज़िंदगी काटने में मजबूर हो जाएगा। तो भाइयों इस विकराल समस्या को और विकराल होने से पहले ही ठोस हल की तलाश शुरू कर दीजिए, वरना नतीजा आपको स्वयं पता है।


- महेश बारमाटे "माही"

Saturday, 14 July 2018

आप तो बड़े शौकीन हैं.. (व्यंग्य)

भाई, मैंने अब तक की अपनी ज़िन्दगी में तरह - तरह के शौक रखने वाले देखे हैं, किसी को क्रिकेट देखने का शौक, तो किसी को क्रिकेट खेलने का शौक, किसी को कुछ खाने का शौक, तो किसी को कुछ पीने का शौक, लाखों तरह के शौक पालते हैं लोग। अब हिन्दी के मशहूर व्यंग्यकार "श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी" के व्यंग्यों में कथित "रामभरोसे जी" को ही देख लो, उसे भी सरकार से नई - नई आशाएं रखने का शौक है, पर इस शौक के चलते वो बेचारा लगभग हर बार वोट बैंक की राजनीति में फंस ही जाता है और दूर न जाये, आप मुझे ही देख लो मैंने भी तो लिखने का शौक पाल रखा है। खैर! मेरी छोड़ो..। आदि काल से ही तरह -  तरह के शौक रखना इंसान की फितरत में ही होता आ रहा है, अगर ऐसा न होता तो कोलंबस ने अमेरिका न खोजा होता। मेरे ख्याल से कोलंबस भाई को यात्राएं करने का शौक रहा होगा, और अगर वो भारतीय होता तो घर वाले तो उसे अपनी गली से भी बाहर नहीं जाने देते। उससे हर पल यही पूछते कि तुझे क्या पड़ी है अमेरिका खोजने की, ये काम कोई और नहीं कर सकता क्या? वगैरह वगैरह सवालातों से बेचारे कोलंबस भाई का जीना हराम कर दिया होता। और वो अमेरिका खोजने के महान कार्य को नहीं कर पाते।

यात्रा के शौक से याद आया, कि पिछले कुछ दिनों से कुछ ऐसे लोगों से मिलना हो रहा है जो एक अलग ही तरह का शौक रखते हैं। और वो शौक है, रेल गाड़ी की समय सारिणी को याद रखने का शौक। ये लोग अगर कहीं जा रहे हैं और सामने से ट्रेन आते दिख जाए, या फिर पास के रेलवे स्टेशन से ट्रेन का हॉर्न ही क्यों न सुन ले, ये बता देते हैं कि फलां फलां गाड़ी ही है जो फलां फलां जा रही होगी। दिन, समय, स्पीड का जोड़ घटाना कर के ये बता देते हैं कि इस वक़्त कौन सी गाड़ी, कितनी स्पीड से किस तरफ जा रही है, तथा उसका नाम क्या है, उसकी पहचान, बोले तो सुपर फास्ट है, एक्सप्रेस है या पैसेंजर गाड़ी है, सब बता देते हैं।

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर मैं आपको ये सब क्यों बात रहा हूँ? तो भाई साहब मैं इस शौक से परेशान हो गया हूँ, क्योंकि रेलवे फाटक से कौन सी ट्रेन निकल रही है इससे मेरा कोई भी लेना देना नहीं है, पर अपनी प्रिय श्रीमती जी को कौन समझाए कि उनके इस शौक से मेरे कान पक जाते हैं, पर टिपिकल भारतीय पति होने के नाते, चुपचाप ट्रेनों का लेखा जोखा सुनना मेरी मजबूरी बन गया है। दिन हो या रात, सुबह हो या शाम, अगर ट्रेन की आवाज भी आ गई, तो मुझे ज्ञात हो ही जायेगा कि इस वक़्त कौन सी ट्रेन कहाँ और किस प्रोफाइल के साथ जा रही है।

हर बात में अच्छाई ढूँढने की आदत से मजबूर मैं सोचता हूँ कि श्रीमती जी की इस आदत से मेरा सामान्य ज्ञान बढ़ तो रहा ही है, और श्रीमती जी की बुद्धि भी थोड़ी तेज भी हो रही है, अतः आप लोगों से विशेषकर इस तरह की विलक्षण प्रतिभा या शौक रखने वाले पति अथवा पत्नियों जी से अनुरोध है कि अपने प्रियवर के ऐसे शौक में कोई न कोई अच्छाई ढूंढ लीजिये फिर आपको भी ज़िन्दगी जीने का नया शौक लग जायेगा और उनसे ये कहने का मौका भी मिल जाएगा कि "आप तो बड़े शौकीन हैं.."।

Thursday, 12 July 2018

डिफॉल्टर विद्युत उपभोक्ता दिवस.. (व्यंग्य)

किसी गाँव में दो पति पत्नी के बीच की बातचीत..


"अजी सुनते हो.."

"क्या हुआ..?"

"अरे! मैंने सुना है कि अपना बिजली का बिल माफ किया जा रहा है.."

"क.. क्या.. क्या बात कर रही हो भागवान.."

"हाँ! सही कह रही हूँ, अभी जब आप अपने नकारा और निकम्मे दोस्तों के साथ जुआ खेलने बाहर बैठे थे न, तो मैं टीवी पे न्यूज सुन रही थी, उसमे बता रहे थे कि सरकार ने हम जैसे लोगों का बिजली का बिल माफ कर दिया है, और तो और हमारे ऊपर जो पिछले साल अस्थायी मोटर पंप कनेक्शन चलाने पर जो कोर्ट केस बना था, न वो भी माफ कर दिया है सरकार ने।"

"अच्छा, और क्या बता रहे थे न्यूज पे..?"

"ज्यादा कुछ नहीं बताया बस ये बताया है कि बिल माफी के लिए बिजली ऑफिस जाना पड़ेगा, बिल लेकर.."

"अब यार! ये बिल कहाँ से लाऊँ?"

" क्यों.. अपने पास बिल नहीं आता क्या?"

"अरे! नहीं भागवान, पिछले महीने जब लाइन मैन बिल लेकर आया था तो मैंने उसको बहुत सुनाया कि बिजली तो आती है नहीं तो बिल काहे का, और बहुत गंदी गंदी गालियाँ देकर बिल उसी के मुँह पर फाड़ के फेक दिया था, सह कहूँ बहुत सुकून मिला था उसकी बेइज्जती कर के"

"अरे जी! अब बिल कहाँ से लाएंगे? एक तो ये बिजली वाले सच मे बिजली तो 24 घंटे देते हैं और आप उनको झूठ बोल के बेइज्जत कर बैठे.."

"तो क्या हुआ, साले जब देखो बिल भी तो मांगते हैं, आखिर बिजली का पैसा तो हराम का पैसा है,  देखो सरकार को ये हराम का पैसा अच्छा हुआ जो माफ कर दिया उन्होंने अपना"

"तो क्या हुआ, अब बिना बिल के कैसे माफ करोगे बिल अपना??"

"उसी लाइन मैन की कॉलर पकड़ के बिल ले लूंगा दूसरा, और क्या..? फिर जितनी बिजली जलानी हो जलाओ, बिल तो हर बार ऐसे ही माफ होने हैं.।"

"सही कह रहे हो, एक बार बिल माफ हो जाये, फिर तो हमारे सर से ये बिल के पैसे का बेकार सा बोझ उतर जाएगा.., और एक बात तो मैं बताना भूल ही गई, वो ये कि कल पूरे राज्य में बिल माफी वाले उपभोक्ताओं को सम्मानित करने के लिये विद्युत उपभोक्ता दिवस मनाया जाएगा, जिसमे अपने क्षेत्र के विधायक साहब के द्वारा अपने जैसे डिफॉल्टर उपभोक्ताओं को सम्मानित करेंगे।"

"अच्छा, ये भी सही है, अब तो हम इन साले बिजली वालों के सामने चिल्ला - चिल्ला के सीना तान के कह सकेंगे कि आखिर तुमने क्या बिगाड़ लिया हमारा, एक रुपया भी नहीं निकाल सके हमारी जेब से..."

"पर.., मुझे न वो अपने पड़ोस वाली भाभी जी है ना उन पर दया आ रही है, मैं हमेशा कहती थी कि भैया जी को समझाओ, बिल भरने से क्या होगा, देखो अब तक उन लोगो ने लाखों रुपया बिल में उड़ा दिए होंगे.."

"अरे! बोला तो मैंने भी था उसे, पर वो कब मानता है, उसे तो ईमानदारी का भूत चढ़ा हुआ था, डरपोक कहीं का, अब देखो हमारे जैसे बिल नहीं भरा होता तो आज इतने पैसे बचा तो लेता..।"

"पर उनके पास तो हमारे जितनी ही जमीन है, फिर भी उनका रहन सहन हमसे कितना अच्छा है, और बिल भी हमेशा भरते हैं वो लोग, हाँ! डरपोक तो हैं, पर पढ़ाई में उनके लड़के भी हमारे बच्चों से अच्छे कैसे हैं..?"

"यार! हराम का पैसा किसे पचता है.. पर तु फालतू बातों में ध्यान न दे.. मैं कल ही जाता हूँ इस बिजली के हराम के पैसे को माफ करा के आता हूँ.."

"हाँ, कल आपको जब विधायक जी के हाथों सम्मानित किया जाएगा तो मैं आपकी पसंद के पकवान दोनों हीटरों पे बना के आपको खिलाऊँगी.."

"चल, मैं जाता हूँ, योजना की थोड़ी बहुत और जानकारी ले आऊँ बिजली ऑफिस से, पता नहीं ये आफिस भी कहाँ होगा, बरसों पहले देखा था मैंने.."

"हाँ, ठीक है, आप जाइये.."

(इतने में बिजली चली जाती है)

"ये लाइट को भी अभी जाना था, ये बिजली वाले मर क्यों नहीं जाते, जीना हराम कर रखा है इन लोगो ने..।"


(कृपया बिजली बिल जमा न करने वाले शूरवीर इस व्यंग्य कथा को दिल पे न लें.. हम आपकी बिल जमा न करने और बिजली वालों का अपमान करने की प्रतिभा का सम्मान करते हैं..)

Sunday, 24 June 2018

तुम केपीओ हो, केपीओ.. (व्यंग्य)

सदियों से इस देश में निचले वर्ग का शोषण हो रहा है, और अब तो ये रिवाज हो गया है। पहले जाति के नाम पर शोषण होता था, आज गरीबी और पद के नाम पर होता है। अमीरों के द्वारा गरीबों का शोषण तो पहले भी होता ही था और अब भी होता ही है, पर जाने कब से प्रथा सी बन गई है कि आप अगर निचले पद पर हों तो आपका शोषण ऊँचे पद वाले व्यक्ति विशेष जरूर करेंगे। और खास तौर पे हमारे सरकारी विभागों के कार्यालयों में।

बात इतनी सी है कि छोटा कर्मचारी अगर शिकायत करेगा तो उसकी सुनेगा कौन? और अगर वह कर्मचारी बाह्य स्त्रोत मेरा मतलब है कि आउट सोर्स से हो तो वो तो कुछ कर ही नहीं सकता, क्योंकि नौकरी जाने का डर तो सबको होता है न। 

बाह्य स्त्रोत की बात से याद आया कि आज कल जाने कहाँ से सरकारी विभागों ने फंडा बना रखा है कि कर्मचारियों की कमी को आउट सोर्स के माध्यम से ही भरा जावे। वैसे आउट सोर्स व्यवस्था के बहुत सारे फायदे हैं, कुछ एक बता ही देता हूँ।

 पहला तो ये, कि नियमित कर्मचारी को जहाँ मोटी मोटी रकम सैलरी के तौर पे दी जाती थी, वहीं आज आउटसोर्सिंग के माध्यम से 5 गुना कम कीमत में नवीन बेरोजगार युवा पीढ़ी को रोजगार मिल जाता है। 

दूसरा ये कि नियमित कर्मचारी तो काम कर कर के हो गया बुड्ढा तो काम करने की एफिशिएंसी भी कम हो गई, अब कम संसाधनों में ज्यादा काम तो नवीन बेरोजगार युवा पीढ़ी ही कर सकती है न ? 

तीसरा ये कि जहाँ किसी नियमित कर्मचारी को कार्य न करने, हड़ताल करने या कार्य करने में अक्षम होने पर दुनिया भर की लिखा पढ़ी करनी पड़ती थी, और साथ में पेंशन नाम का आर्थिक बोझ झेलना पड़ता था, वहीं इन आउटसोर्स कर्मचारियों को ऐसी परिस्थितियों में ये कह के निकाल दिया जाता है, कल से काम पे मत आना।

और भी कई फायदे हैं, जो आप जानते ही होंगे अगर मेरे जैसे किसी सरकारी दफ्तर में विराजमान होंगे।

सोचो! कितना फायदेमंद है न, इन आउटसोर्स कर्मचारियों से जी चाहा काम लेना? इनसे हद से ज्यादा काम लिया जा सकता है, इन्हें जैसा चाहे वैसा काम लिया जा सकता है, और अगर कभी पत्नी जी से साहब जी खरी खोटी सुन के आये तो वो सारा गुस्सा भी इन पर ही निकाला जा सकता है। ये बेचारे उफ्फ भी नहीं कर सकते। क्योंकि इनको तो कोई अधिकार ही नहीं है, अपनी बात कहने का, अपने मन से काम करने का।

भले ये आउट सोर्स के तुच्छ कर्मचारी 7-8 हजार में किसी पचास हजार के कर्मचारी का काम कर रहे हों। या फिर पूरे कार्यालय का अधिभार इनके ही कोमल कंधों पर ही क्यों न हो।

केपीओ बोले तो "की पंचिंग ऑपरेटर" मतलब हमारे ऑफिस में आउट सोर्स के माध्यम से पदस्थ एक छोटा सा कंप्यूटर ऑपरेटर। जिसे एक अधिकारी के नजर से देखें तो कुछ आता ही नहीं है, पर जनाब! आप चूक कर सकते हैं क्योंकि मैंने अक्सर अखबारों में सुना है कि फलां फलां केपीओ ने साहब की आई डी का दुरुपयोग कर के जनता के पैसे ले कर फरार हो गया। हाँ! वही केपीओ जिसको साहब ने ही दया कर के अपने रिस्क पे अपने आफिस में नौकरी पर लगाया और वही धोखा दे गया।

ऐसे में किसी केपीओ प्रजाति के आउट सोर्स कर्मचारी का शोषण न किया जाये तो भला क्या किया जाए? वो साहब से शायद थोड़ा ज्यादा जानता है, और साहब की कंप्यूटर आई डी का सदुपयोग संग दुरुपयोग किस प्रकार किया जा सकता है उसे भली भांति पता होता है। ऐसे में यदि साहब ऐसे केपीओ महोदय को अगर डाँट डपट के न रखें तो चींटी के पर निकल आएंगे।

अभी कुछ दिन पहले उड़ती हुई खबर मेरे पास आई, कि एक नवीनतम पदाधिकारी ने जब अपने अधीनस्थ किसी कार्यालय सहायक को कोई जानकारी पूछने के लिए अपने केबिन में बुलाया तो उस कर्मचारी के स्थान पर केपीओ महोदय चले गए, आखिर जाते भी क्यों नहीं, क्योंकि कार्यालय सहायक जी तो बस मदिरापान के लिए आफिस आते हैं और सारा कार्यभार बस के पी ओ को ही संभालना होता है, फिर भी नवीनतम पदाधिकारी महोदय ने श्रीमान केपीओ महोदय को ये कह के दुत्कार दिया कि तुम केपीओ हो केपीओ, तुम मेरे सामने कैसे आये? 

साहब जी ने भी सही बोला उस आउटसोर्स कर्मचारी से क्योंकि उसका क्या हक कि वो इतने बड़े अधिकारी के सामने बेवजह बिना बुलाये उपस्थित हो जाये। पर किसी के बोलने के ढंग का क्या भरोसा, कब किसका दिल दुख जाए?

ऐसे में आउट सोर्स कर्मचारी जो बस शोषण के लिए ही इस दफ्तर में लगा हुआ है उसे बुरा नहीं मानना चाहिए, क्योंकि भाई! ये तो पीढ़ियों से होता आ रहा है, अपने से दुर्बल, निर्धन, या निचले पद के व्यक्ति शोषण होता है और होता ही रहेगा। आखिर पुरानी मान्यताओं और रीति रिवाजों को चलाना भी तो है और तुम केपीओ हो, तुम को सहना ही होगा।


- महेश बारमाटे "माही"

24/6/18

1:11 am

Saturday, 16 June 2018

बेलन, बीवी और दर्द (व्यंग्य)

शीर्षक पढ़ के क्या सोच में पड़ गए जनाब..? कहीं आपको आपकी ज़िंदगी का कोई किस्सा तो याद नहीं आ गया? अजी मैं उसी बेलन का ज़िक्र कर रहा हूँ जिसके बगैर एक आदर्श भारतीय घर का किचन अधूरा होता है..। यूँ तो हम सभी जानते हैं कि बेलन का महत्व हम सब की ज़िन्दगी में क्या होता है और क्यों..? यार! बेलन न हो तो रोटी बनाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, बेलन न हो तो आपके फेवरेट पराठे और गरमागरम पूड़ियाँ कैसे बनेंगी? सोचो कि अगर बेलन का आविष्कार नहीं हुआ होता तो आज हम तरह तरह की डिश का लुत्फ कैसे उठाते..? न रोटियाँ सही आकार व मोटाई में मिलती, न पराठे व पूड़ियाँ और न ही खाने के साथ हमेशा साथ देने वाले तरह - तरह के पापड़ का हम लुत्फ़ उठा पाते.. मैं तो हमेशा से ही इन छोटी - छोटी चीजों के आविष्कारकों  को नमन करता रहता हूँ कि आखिर उनके ही कारण मेरा जीवन आसान बन पाया है।

ये तो रहा बेलन का पहला पहलू.. अब बात रही एक अन्य पहलू की.. हालांकि बेलन किसी सिक्के की तरह गोल नहीं होता कि इसका कोई दूसरा पहलू हो, पर व्यहवारिकता में तो इसके एक नहीं, दो नहीं बल्कि तीन पहलू होते हैं, जो मैंने अभी अभी जाने हैं। 

तो मैं बात कर रहा था बेलन के दूसरे पहलू के बारे में.. और वो अक्सर हमें हास्य के कार्टून में जरूर देखने को मिलता है जब कोई छोटी सी भी गलती हो, घर का कोई सामान टूट गया हो तो मम्मी किचन से बस बेलन लेकर आते दिखती है। भाई कार्टूनिस्ट ने तो मम्मी (और बीवियों) के लिए एक सशक्त अस्त्र - ओ - शस्त्र के रूप में बेलन को एक नई पहचान दी है। और इसके लिए बेलन भी यदि कोई सजीव प्राणी होता तो जरूर मेरी तरह अपने आविष्कारक को प्रतिदिन धन्यवाद जरूर करता होता। हालांकि शायद ही किसी मम्मी ने अपने बच्चों को बेलन से दण्ड दिया होगा, पर मुझे लगता है कि किसी न किसी बीवी जी ने अपने शौहर जी को इसका स्वाद जरूर चखाया होगा। ऐसे पतियों से करबद्ध माफी चाहूंगा क्योंकि मैंने जाने अनजाने में शायद मैंने उनकी किसी दुखती रग पे हाथ रख दी दिया होगा।

दुखती रग से याद आया, इस बेलन महाराज के तीसरे और ताजे ताजे पहलू के बारे में। ताजा इसीलिए क्योंकि ये पहलू अभी अभी मेरे समक्ष आया है। और इसी पहलू ने मुझे ये व्यंग्य लिखने के लिए प्रेरित भी कर दिया है। तो वाकया ये है कि कल सुबह से ही मेरी पीठ की एक नस ने मुझसे रूठ के जरा खिंच सी गई.. सो आज तक वो रूठी हुई है। 

दर्द के मारे हाल बेहाल, 

न नींद है और न करार..।

बस फिर क्या था, मेरी प्रिय पत्नी जी को भी मेरा दर्द सहन नहीं हुआ, और इस दर्द से मुझे निजात दिलाने के लिए तरह - तरह के दर्द निवारको के घरेलू उपायों की खोजबीन जारी हो गई। और इसी खोजबीन के चलते हमारे पड़ौस वाली भाभी जी ने भी एक नुस्खा हमारी मैडम जी को सुझा दिया, और बोल दिया कि पीठ सीधी कर के बेलन से बेल दो, नस जी जो रूठी हुई हैं मान के सही जगह पे आ जायेगी, फिर न तो दर्द होगा और न ही कोई पीड़ा.. बस फिर क्या था, पत्नी जी ने उठाया बेलन और चला दिया हमारी दुखती रग में.. और आप यकीन मान ही लीजिए कि दुखती नस जी कुछ देर के लिए तो मान गईं और मुझे दर्द से रिश्ता तोड़ना पड़ा। हालांकि ये दर्द इतनी जल्दी मुझसे अपना रिश्ता तोड़ेगा नहीं पर उम्मीद है कि कुछ न कुछ तो जरूर होगा और पत्नी जी की मेहनत रंग लाएगी। और इस तरह मेरे दर्द का अंत हो जाएगा। आखिर बेलन के तीसरे पहलू को भी तो अपना अस्तित्व कायम करना होगा न। मेहनत तो बेलन जी ने भी किया है।

खैर! ये दर्द तो ठीक हो ही रह है, आप जाइये और अपनी पत्नी जी के हाथों से घी चुपड़ी रोटियां खाइये। और सीमित रहें बेलन के पहले पहलू तक.. इसी आशा में..

आपका

महेश बारमाटे "माही"

Monday, 11 June 2018

Dhanno, Basanti aur Basant... (धन्नो, बसंती और बसंत)

नमस्कार दोस्तों!
बहुत दिनों बाद, कुछ दिल से... लिखने का मन किया... हालांकि मैं अक्सर दिल से ही लिखता हूँ, फिर भी आज सोचा आपसे साझा किया जाये तो बहुत अच्छा होगा। मेरे इस लेख के शीर्षक से आपको सुप्रसिद्ध हिन्दी फीचर फिल्म "शोले " की याद आ गई होगी। और शायद आप सोच रहे होगे कि मैं बीते जमाने की इस सुपरहिट फिल्म के बारे में कुछ नया या फिर कुछ घिसपिटा सा सुनाने वाला हूँ। तो दोस्तों! ऐसा कुछ भी नहीं है। 
मैं तो आदरणीय व्यंग्यकार, जिन्हे ब्लॉग जगत में सभी जानते हैं, श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी द्वारा रचित व्यंग्य संकलन "धन्नो, बसंती और बसंत" के बारे में अपना अनुभव आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। और सच कहूँ तो यह पहला व्यंग्य संकलन है जिसे मैंने पढ़ा है। हालांकि मैंने और भी कई किताबें पढ़ी हैं पर व्यंग्य पहली बार। 
इस किताब की शुरुआत में ही मुझे हास्य और व्यंग्य दोनों विधाओं में जो सूक्ष्म अंतर है वो समझ में आ गया। डेली हंट ई-बुक्स के एण्ड्रोइड एप के माध्यम से मुझे उनका यह संकलन पढ़ने को मिला। अभी कुछ दिन पहले ही मैंने यह किताब (ई- बुक) डाउनलोड की और अब भी पढ़ ही रहा हूँ, पर मुझसे रहा ही न गया कि पूरी किताब पढ़ने के बाद इसकी प्रशंसा करूँ। बस मन किया और आज आपके समक्ष हूँ मई। 
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी ने बड़े ही संजीदा तरीके से रोज़मर्रा की जिंदगी से संबन्धित विषयों पर व्यंग्य लिखा है, जिसे पढ़ कर आप भी एक बार सोचने जरूर लगेंगे की यार! ये बात मेरे दिमाग में क्यों नहीं आई। विषय की सूक्ष्मता और शब्दों का सही प्रयोग, श्री विवेक रंजन सर को बखूबी आता है। 
श्री विवेक रंजन सर के बारे में आप यूं तो जानते ही होंगे, पर तब भी एक सूक्ष्म सा परिचय देना तो लाज़मी भी है। अतः श्री विवेक रंजन सर जबलपुर के ही निवासी हैं, हाँ! जबलपुर के, जहां से मैं भी हूँ। और इतने साल बाद अप्रेल 2018 में उनसे मिलना हुआ, मिल के बहुत प्रसन्नता हुई कि जितने बड़े पद (मुख्य अभियंता) पर वे म॰ प्र॰ विद्युत मण्डल, जबलपुर में आसीन हैं, उतना ही सादगीपूर्ण स्वभाव और साहित्य के प्रति अपना सर्वस्व प्रदान करने वाले व्यक्तिव के धनी व्यक्ति हैं। जबलपुर की साहित्यिक संस्था में प्रांतीय अध्यक्ष पद पर आसीन श्री विवेक रंजन सर हमेशा साहित्य जगत के नए लोगों को प्रोत्साहित करने में बस लगे रहते हैं। आशा है उनकी रचनाओं को पढ़ने के बाद मुझे और आपको काफी कुछ सीखने को मिलेगा। और जरूर मिलेगा। 
अब आते हैं पुनः हम किताब की ओर - 
जैसा कि मैंने पहले ही आपको बता दिया है कि "धन्नो, बसंती और बसंत" किताब एक व्यंग्य संकलन है, जो कि रोज़मर्रा की जिंदगी से संबन्धित विषयों पर कटाक्ष करते हुये व्यग्यात्मक शैली में लिखी गई है। इसके प्रथम पृष्ठ से ही आप इस किताब में खो जाएँगे। और यदि आपको व्यंग्य पढ़ने का भी अगर शौक न हो तो भी एक अध्याय पढ़ने के बाद आपको लगेगा कि हाँ! सच में पढ़ने में मजा आ रहा है। इसीलिए मैं इस किताब को आपको पढ़ने के लिए ज़ोर डाल कर कहता हूँ कि कृपया एक बार तो पढ़ें जरूर। 
अब मैंने लिंक तो बताया भी नहीं... तो पढ़ेंगे कैसे ?
तो लिंक इस प्रकार है - 

बस 369 केबी की ई-बुक है और यूं तो 100 /- इसकी कीमत है पर डेली हंट पे फिलहाल 80% छूट के साथ केवल 20 /- रु मात्र में मिल रही है। आसानी से डाउन लोड भी हो जाती है। बस इसके लिए आपके गूगल प्ले स्टोर में आपको जाना होगा, डेली हंट बुक्स एप डाउनलोड करना होगा, अपना अकाउंट बनाने के बाद आप इस बुक को खरीद कर व्यंग्य की दुनिया का लाभ उठा सकते हैं। 
आशा है कि आपको मेरा ये लेख पसंद आया होगा। 
चलिये आप इस बुक को पढ़ना स्टार्ट करें, और मैं इसे पढ़ के पूरा करना..। 

- महेश बारमाटे "माही"