Tuesday, 16 February 2010

सच या झूठ...?

सच या झूठ ...?


बचपन में, जब बच्चा बोलना, समझना सीखने लायक हो जाता है, तब से उसे उसके PARENTS हमेशा यही सीख देते हैं की "बेटा ! सच का साथ कभी मत छोड़ना, चाहे कुछ भी हो सच ही बोलना, हर वक़्त - हर एक situation में"।

और फिर वो बच्चा इन्ही अच्छी सीखोंके साथ बड़ा होता है। हर जगह, हर बात में , यहाँ तक कि हर एक रिश्ते में वो सच्चाई का साथ निभाता है, क्योंकि उसके बाल-मन में एक बात अच्छी तरह से घर कर गई होती है कि "झूठ की बुनियाद पर कोई भी रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं टिक सकता"। अब वो बालक और बड़ा होता है और जवानी की दहलीज पर कदम रखता है। जवानी की दहलीज पर भी वो बालक जो भी नए रिश्ते बनता है उनमे हमेशा ही सच्चाई का पूरा साथ देता है। वो उन रिश्तों में कभी भी झूठ का साया भी पड़ने नहीं देना चाहता और अपने इस उद्देश्य में वो कामयाब भी होता है। यद्यपि वो शख्श जिसके साथ वो ये नया रिश्ता जोड़ता है (नए रिश्ते से मेरा तात्पर्य - दोस्ती या प्यार से ही है) वो झूठा है। पर ये जान कर भी वो बालक अपने सच के मार्ग से विचलित नहीं होता। वो हर वक़्त हर कदम पर हमेशा ही उसके सामने सच्चाई ही पेश करता है।

फिर १ दिन, उनके रिश्ते में १ ऐसा मोड़ आता है कि हमारा सच्चाई का साथ देने वाला जवान, पूरी सच्चाई के साथ अपने साथी से विश्वास पूर्वक अपनी कुछ PERSONAL बातें SHARE करता है। और उसे ये महसूस होता है कि उनके रिश्ते पर उंगली उठ सकती है इसी कारण वो उससे कहता है कि "Please मेरी बातों को समझने कि कोशिश करो और हमारे दरम्यान कुछ फासले रहने दो", पर उसके साथी को ये बात तो तब समझ में आएगी जब उसने कभी सच का साथ दिया हो। मेरा मतलब है कि वो शख्श जिसने हमेशा अपने साथी के प्रति यही भावना राखी हो कि उसका साथी कभी सच नहीं बोलता तो वो कैसे उसकी सच्ची बातें समझ में आएंगी ? ऐसे में वो अपने सच्चे साथी कि कोई भी बात नहीं सुनता/सुनती और उसे खरी-खोटी सुना के उसकी सारी बातों को अनसुना कर देता/देती है। हमारा सच्चा दोस्त अपनी सफाई में १ शब्द भी नहीं बोल पता। कभी कभी तो उनका रिश्ता भी दांव पे लग जाता है। सामने वाला अपने गुरूर में ये भी भूल जाता है कि जिसने हमेशा उसका साथ दिया, आज उसकी बात अनसुनी कर के वो कितने बड़ी गलती कर रहा है।

अब ऐसे में कोई मुझे बताए कि उस सच्चे इंसान को क्या करना चाहिए जबकि उसकी बातें सुनी न जाए ? उसका ये रिश्ता तो लगभग टूट ही चूका है। अब वो चाहे जितनी भी कोशिश कर ले BUT कुछ भी नहीं हो सकता क्योंकि कोई उसकी बात सुनने को तैयार ही नहीं।

तो क्या उसे अब अपने अगले ऐसे किसी नए रिश्ते कि शुरुआत झूठ से करनी चाहिए क्योंकि सच की बुनियाद पे बना रिश्ता तो चार पल भी टिक न सका या फिर उसे अपने पुराने साथी के वापस आने का इंतज़ार करना चाहिए जबकि ऐसी कोई उम्मीद ही न हो ? या फिर हताश होकर दुनिया ही छोड़ देनी चाहिए ?

या और कुछ...?

Please कोई तो बताओ... आज ये महेश भी परेशान है इन बातों की खातिर।

By
Mahesh Barmate (Maahi)
20/Dec/2009