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सब्जी क्या बनाऊँ : एक राष्ट्रीय समस्या (व्यंग्य)

 हमारे भारत में राष्ट्रीय तौर पर उभर रही है एक समस्या, जिससे समस्त गृहणियाँ और साथ में बेचारे पति भी परेशान रहते हैं, उससे न जाने कितने परिवारों में दिन में न जाने कितनी बार मनमुटाव, लड़ाई झगड़ा और यहाँ तक कि मार पीट की भी नौबत आ जाती है, उस समस्या का नाम है - " सब्जी क्या बनाऊँ?" जी हाँ! इस समस्या से मेरे हिसाब से लगभग हर पति परेशान हुआ जरूर होगा। वैसे तो ये समस्या केवल गृहणियों की ही है पर इसके साइड इफ़ेक्ट तो सबसे ज्यादा पतियों को ही झेलने पड़ते हैं। और ये समस्या अक्सर शाम के वक़्त ही देखने को मिलती है, क्योंकि हमारे देश के सर्वाधिक पति जब भी काम से घर लौटते हैं, उनसे ये बात जरूर पूछी जाती है, कि सब्जी क्या बनाऊँ? अब ऐसे में बेचारा पति जो ऑफिस से बॉस की खरीखोटी सुन के आया हो, किसी उपभोक्ता से या अपने क्लाइंट से अपनी कंपनी या विभाग की गलत नीतियों को सही साबित करने के चक्कर में ही कुछ जबरदस्त टाइप की बहस कर के आया हो, उसके दिमाग मे अब भी उसी बॉस, क्लाइंट या उपभोक्ता की बातें घूम रही हों, तो भी वो खुद को नॉर्मल सा दिखाने के चक्कर में मन को शांत कर रहा हो, तभी उनकी प्रिय पत्नी जी न...

आप तो बड़े शौकीन हैं.. (व्यंग्य)

भाई, मैंने अब तक की अपनी ज़िन्दगी में तरह - तरह के शौक रखने वाले देखे हैं, किसी को क्रिकेट देखने का शौक, तो किसी को क्रिकेट खेलने का शौक, किसी को कुछ खाने का शौक, तो किसी को कुछ पीने का शौक, लाखों तरह के शौक पालते हैं लोग। अब हिन्दी के मशहूर व्यंग्यकार "श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी" के व्यंग्यों में कथित " रामभरोसे जी " को ही देख लो, उसे भी सरकार से नई - नई आशाएं रखने का शौक है, पर इस शौक के चलते वो बेचारा लगभग हर बार वोट बैंक की राजनीति में फंस ही जाता है और दूर न जाये, आप मुझे ही देख लो मैंने भी तो लिखने का शौक पाल रखा है। खैर! मेरी छोड़ो..। आदि काल से ही तरह -  तरह के शौक रखना इंसान की फितरत में ही होता आ रहा है, अगर ऐसा न होता तो कोलंबस ने अमेरिका न खोजा होता। मेरे ख्याल से कोलंबस भाई को यात्राएं करने का शौक रहा होगा, और अगर वो भारतीय होता तो घर वाले तो उसे अपनी गली से भी बाहर नहीं जाने देते। उससे हर पल यही पूछते कि तुझे क्या पड़ी है अमेरिका खोजने की, ये काम कोई और नहीं कर सकता क्या? वगैरह वगैरह सवालातों से बेचारे कोलंबस भाई का जीना हराम कर दिया होता। और वो अमेरि...

तुम केपीओ हो, केपीओ.. (व्यंग्य)

सदियों से इस देश में निचले वर्ग का शोषण हो रहा है, और अब तो ये रिवाज हो गया है। पहले जाति के नाम पर शोषण होता था, आज गरीबी और पद के नाम पर होता है। अमीरों के द्वारा गरीबों का शोषण तो पहले भी होता ही था और अब भी होता ही है, पर जाने कब से प्रथा सी बन गई है कि आप अगर निचले पद पर हों तो आपका शोषण ऊँचे पद वाले व्यक्ति विशेष जरूर करेंगे। और खास तौर पे हमारे सरकारी विभागों के कार्यालयों में। बात इतनी सी है कि छोटा कर्मचारी अगर शिकायत करेगा तो उसकी सुनेगा कौन? और अगर वह कर्मचारी बाह्य स्त्रोत मेरा मतलब है कि आउट सोर्स से हो तो वो तो कुछ कर ही नहीं सकता, क्योंकि नौकरी जाने का डर तो सबको होता है न।  बाह्य स्त्रोत की बात से याद आया कि आज कल जाने कहाँ से सरकारी विभागों ने फंडा बना रखा है कि कर्मचारियों की कमी को आउट सोर्स के माध्यम से ही भरा जावे। वैसे आउट सोर्स व्यवस्था के बहुत सारे फायदे हैं, कुछ एक बता ही देता हूँ।  पहला तो ये, कि नियमित कर्मचारी को जहाँ मोटी मोटी रकम सैलरी के तौर पे दी जाती थी, वहीं आज आउटसोर्सिंग के माध्यम से 5 गुना कम कीमत में नवीन बेरोजगार युवा पीढ़ी को रोजगार मिल ज...

आप देंगे न मेरा साथ ? (Welcome to me)

दोस्तों ! बहुत दिनों बाद आया हूँ, क्या करूँ ? ब्लॉग्गिंग छोड़ना नहीं चाहता था पर मेरे जॉब ने मुझे ऐसे मुकाम पे ला फेका कि इन्टरनेट से दूर ही हो गया था मैं। नेट ऑन  करता तो बस इ-मेल देखने के लिए... क्योंकि ब्लॉग्स्पॉट  तो लो स्पीड इंटरनेट पे वर्क ही नहीं करता। पर एक ब्लॉगर को तो बस इन्टरनेट चाहिए कहीं से भी... और मैंने भी वही किया, बस बीएसएनएल ब्रॉडबैंड की संभावनाओं को तलाशा और इस गाँव में भी पा लिया ब्रॉडबैंड... अब मैं फिर से ब्लॉगिंग मे आ गया... मुझे आज भी याद है जब मैं रात रात भर ब्लॉगिंग में अपनी नींदे भूल जाया करता था... मैंने हिन्दी ब्लॉगिंग गाइड के लिए जो कार्य शुरू किया था वो आज भी अधूरा ही लगता है। मैं ब्लॉगिंग की दुनिया दूर चला गया तो आप लोग भूल गए होंगे मुझे, है न ?  चलो कोई बात नहीं, अब फिर से आप सभी के दिलों में जगह बनानी है,  मेरे पास अब भी बहुत सी नयी कवितायें और नई कहानी हैं...  तो फिर दोस्तों ! बस एक काम कर दो यार... मुझे थोड़ी सी, बस थोड़ी सी ही हिम्मत और आपके प्रोत्साहन की जरूरत है... आप देंगे न मेरा साथ ? अपन...

हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड : मेरी नज़र से (भाग 5)

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वो देखो मेरा ख्वाब चला आ रहा है "माही" के ज़मीन पे पैर अब पड़ते नहीं मेरे...  आज हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड के अन्य लेखों व लेखकों के बारे में चर्चा करने से पहले मैं आपको एक नयी खुशखबरी देना पसंद करूँगा. वैसे खुश खबरी एक नहीं दो - दो हैं, एक हमारी प्यारी हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड की तरफ से और दूसरी मेरी तरफ से...  तो पहले कौन सी सुनाऊं ?  चलिए हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड के बारे में ही खुशखबरी दे देता हूँ सबसे पहले... तो वह खुशखबर ये है कि हमारी "हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड" के फेसबुक पेज के २ अगस्त २०११ को ३० प्रसंशक होने की ख़ुशी में फेसबुक ने हमें एक नया तोहफा दिया है और वो ये कि अब हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड का खुद का एक नया यूज़र नेम मिल गया है, आसान शब्दों में अगर कहूँ तो हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड को एक नया परमानेंट लिंक मिल गया है. मैं इस लिंक को यहाँ साझा कर रहा हूँ... http://www.facebook.com/HindiBloggingGuide/ वैसे शायद ये सूचना आपको मेरे द्वारा फेसबुक पे मिल ही गई होगी. फिर भी ख़ुशी को जितना बांटो उतना ही कम होता है, और ख़ुशी तो बांटने से हमेशा बढ़ती ही जाती है.  फेस...