एक सोच, एक सुझाव और एक क्रांति
जब से मैं इस ब्लॉग्गिंग की दुनिया में आया हूँ, तब से मैंने पाया है कि लगभग हर प्रदेश या शहर विशेष के चंद चिट्ठाकारों (Bloggers) ने मिल कर एक ब्लॉग असोसिएशन बना लिया या फिर किसी स्थान विशेष पर निश्चित समय पर पहुँच के एक छोटी सी संगोष्ठी या सम्मलेन का आयोजन कर डाला. सम्मलेन में कुछ लोगों को उनके हिंदी ब्लॉग्गिंग क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के लिए कुछ पुरुस्कार भी दिए गए और फिर हिंदी ब्लॉग्गिंग के सुन्दर भविष्य पर थोड़ा चिंतन व मनन के पश्चात् उस समारोह का सारा सारांश समाचार के रूप में चित्रों समेत किसी ब्लॉग विशेष पे सजा दिया जाता है. डरिये मत, मैं ऐसे किसी भी समारोह या असोसिएशन के खिलाफ नहीं हूँ, बल्कि मैं यह बताना चाहता हूँ कि इस साहित्य जगत में एक शहर ऐसा भी है जहां से साहित्य के अनमोल हीरे निकले और उन्होंने हिंदी साहित्य को गगनचुम्बी ऊंचाइयों तक पहुँचाया. उनमे से कुछ अनमोल हीरों के नाम मैं लेना चाहूँगा - "श्री हरिशंकर परसाई जी, सुभद्रा कुमारी चौहान जी, द्वारका प्रसाद मिश्र जी, भवानी प्रसाद मिश्र जी ... " और न जाने कितने हीरों का श...