Sunday, 24 June 2018

तुम केपीओ हो, केपीओ.. (व्यंग्य)

सदियों से इस देश में निचले वर्ग का शोषण हो रहा है, और अब तो ये रिवाज हो गया है। पहले जाति के नाम पर शोषण होता था, आज गरीबी और पद के नाम पर होता है। अमीरों के द्वारा गरीबों का शोषण तो पहले भी होता ही था और अब भी होता ही है, पर जाने कब से प्रथा सी बन गई है कि आप अगर निचले पद पर हों तो आपका शोषण ऊँचे पद वाले व्यक्ति विशेष जरूर करेंगे। और खास तौर पे हमारे सरकारी विभागों के कार्यालयों में।

बात इतनी सी है कि छोटा कर्मचारी अगर शिकायत करेगा तो उसकी सुनेगा कौन? और अगर वह कर्मचारी बाह्य स्त्रोत मेरा मतलब है कि आउट सोर्स से हो तो वो तो कुछ कर ही नहीं सकता, क्योंकि नौकरी जाने का डर तो सबको होता है न। 

बाह्य स्त्रोत की बात से याद आया कि आज कल जाने कहाँ से सरकारी विभागों ने फंडा बना रखा है कि कर्मचारियों की कमी को आउट सोर्स के माध्यम से ही भरा जावे। वैसे आउट सोर्स व्यवस्था के बहुत सारे फायदे हैं, कुछ एक बता ही देता हूँ।

 पहला तो ये, कि नियमित कर्मचारी को जहाँ मोटी मोटी रकम सैलरी के तौर पे दी जाती थी, वहीं आज आउटसोर्सिंग के माध्यम से 5 गुना कम कीमत में नवीन बेरोजगार युवा पीढ़ी को रोजगार मिल जाता है। 

दूसरा ये कि नियमित कर्मचारी तो काम कर कर के हो गया बुड्ढा तो काम करने की एफिशिएंसी भी कम हो गई, अब कम संसाधनों में ज्यादा काम तो नवीन बेरोजगार युवा पीढ़ी ही कर सकती है न ? 

तीसरा ये कि जहाँ किसी नियमित कर्मचारी को कार्य न करने, हड़ताल करने या कार्य करने में अक्षम होने पर दुनिया भर की लिखा पढ़ी करनी पड़ती थी, और साथ में पेंशन नाम का आर्थिक बोझ झेलना पड़ता था, वहीं इन आउटसोर्स कर्मचारियों को ऐसी परिस्थितियों में ये कह के निकाल दिया जाता है, कल से काम पे मत आना।

और भी कई फायदे हैं, जो आप जानते ही होंगे अगर मेरे जैसे किसी सरकारी दफ्तर में विराजमान होंगे।

सोचो! कितना फायदेमंद है न, इन आउटसोर्स कर्मचारियों से जी चाहा काम लेना? इनसे हद से ज्यादा काम लिया जा सकता है, इन्हें जैसा चाहे वैसा काम लिया जा सकता है, और अगर कभी पत्नी जी से साहब जी खरी खोटी सुन के आये तो वो सारा गुस्सा भी इन पर ही निकाला जा सकता है। ये बेचारे उफ्फ भी नहीं कर सकते। क्योंकि इनको तो कोई अधिकार ही नहीं है, अपनी बात कहने का, अपने मन से काम करने का।

भले ये आउट सोर्स के तुच्छ कर्मचारी 7-8 हजार में किसी पचास हजार के कर्मचारी का काम कर रहे हों। या फिर पूरे कार्यालय का अधिभार इनके ही कोमल कंधों पर ही क्यों न हो।

केपीओ बोले तो "की पंचिंग ऑपरेटर" मतलब हमारे ऑफिस में आउट सोर्स के माध्यम से पदस्थ एक छोटा सा कंप्यूटर ऑपरेटर। जिसे एक अधिकारी के नजर से देखें तो कुछ आता ही नहीं है, पर जनाब! आप चूक कर सकते हैं क्योंकि मैंने अक्सर अखबारों में सुना है कि फलां फलां केपीओ ने साहब की आई डी का दुरुपयोग कर के जनता के पैसे ले कर फरार हो गया। हाँ! वही केपीओ जिसको साहब ने ही दया कर के अपने रिस्क पे अपने आफिस में नौकरी पर लगाया और वही धोखा दे गया।

ऐसे में किसी केपीओ प्रजाति के आउट सोर्स कर्मचारी का शोषण न किया जाये तो भला क्या किया जाए? वो साहब से शायद थोड़ा ज्यादा जानता है, और साहब की कंप्यूटर आई डी का सदुपयोग संग दुरुपयोग किस प्रकार किया जा सकता है उसे भली भांति पता होता है। ऐसे में यदि साहब ऐसे केपीओ महोदय को अगर डाँट डपट के न रखें तो चींटी के पर निकल आएंगे।

अभी कुछ दिन पहले उड़ती हुई खबर मेरे पास आई, कि एक नवीनतम पदाधिकारी ने जब अपने अधीनस्थ किसी कार्यालय सहायक को कोई जानकारी पूछने के लिए अपने केबिन में बुलाया तो उस कर्मचारी के स्थान पर केपीओ महोदय चले गए, आखिर जाते भी क्यों नहीं, क्योंकि कार्यालय सहायक जी तो बस मदिरापान के लिए आफिस आते हैं और सारा कार्यभार बस के पी ओ को ही संभालना होता है, फिर भी नवीनतम पदाधिकारी महोदय ने श्रीमान केपीओ महोदय को ये कह के दुत्कार दिया कि तुम केपीओ हो केपीओ, तुम मेरे सामने कैसे आये? 

साहब जी ने भी सही बोला उस आउटसोर्स कर्मचारी से क्योंकि उसका क्या हक कि वो इतने बड़े अधिकारी के सामने बेवजह बिना बुलाये उपस्थित हो जाये। पर किसी के बोलने के ढंग का क्या भरोसा, कब किसका दिल दुख जाए?

ऐसे में आउट सोर्स कर्मचारी जो बस शोषण के लिए ही इस दफ्तर में लगा हुआ है उसे बुरा नहीं मानना चाहिए, क्योंकि भाई! ये तो पीढ़ियों से होता आ रहा है, अपने से दुर्बल, निर्धन, या निचले पद के व्यक्ति शोषण होता है और होता ही रहेगा। आखिर पुरानी मान्यताओं और रीति रिवाजों को चलाना भी तो है और तुम केपीओ हो, तुम को सहना ही होगा।


- महेश बारमाटे "माही"

24/6/18

1:11 am

Saturday, 16 June 2018

बेलन, बीवी और दर्द (व्यंग्य)

शीर्षक पढ़ के क्या सोच में पड़ गए जनाब..? कहीं आपको आपकी ज़िंदगी का कोई किस्सा तो याद नहीं आ गया? अजी मैं उसी बेलन का ज़िक्र कर रहा हूँ जिसके बगैर एक आदर्श भारतीय घर का किचन अधूरा होता है..। यूँ तो हम सभी जानते हैं कि बेलन का महत्व हम सब की ज़िन्दगी में क्या होता है और क्यों..? यार! बेलन न हो तो रोटी बनाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, बेलन न हो तो आपके फेवरेट पराठे और गरमागरम पूड़ियाँ कैसे बनेंगी? सोचो कि अगर बेलन का आविष्कार नहीं हुआ होता तो आज हम तरह तरह की डिश का लुत्फ कैसे उठाते..? न रोटियाँ सही आकार व मोटाई में मिलती, न पराठे व पूड़ियाँ और न ही खाने के साथ हमेशा साथ देने वाले तरह - तरह के पापड़ का हम लुत्फ़ उठा पाते.. मैं तो हमेशा से ही इन छोटी - छोटी चीजों के आविष्कारकों  को नमन करता रहता हूँ कि आखिर उनके ही कारण मेरा जीवन आसान बन पाया है।

ये तो रहा बेलन का पहला पहलू.. अब बात रही एक अन्य पहलू की.. हालांकि बेलन किसी सिक्के की तरह गोल नहीं होता कि इसका कोई दूसरा पहलू हो, पर व्यहवारिकता में तो इसके एक नहीं, दो नहीं बल्कि तीन पहलू होते हैं, जो मैंने अभी अभी जाने हैं। 

तो मैं बात कर रहा था बेलन के दूसरे पहलू के बारे में.. और वो अक्सर हमें हास्य के कार्टून में जरूर देखने को मिलता है जब कोई छोटी सी भी गलती हो, घर का कोई सामान टूट गया हो तो मम्मी किचन से बस बेलन लेकर आते दिखती है। भाई कार्टूनिस्ट ने तो मम्मी (और बीवियों) के लिए एक सशक्त अस्त्र - ओ - शस्त्र के रूप में बेलन को एक नई पहचान दी है। और इसके लिए बेलन भी यदि कोई सजीव प्राणी होता तो जरूर मेरी तरह अपने आविष्कारक को प्रतिदिन धन्यवाद जरूर करता होता। हालांकि शायद ही किसी मम्मी ने अपने बच्चों को बेलन से दण्ड दिया होगा, पर मुझे लगता है कि किसी न किसी बीवी जी ने अपने शौहर जी को इसका स्वाद जरूर चखाया होगा। ऐसे पतियों से करबद्ध माफी चाहूंगा क्योंकि मैंने जाने अनजाने में शायद मैंने उनकी किसी दुखती रग पे हाथ रख दी दिया होगा।

दुखती रग से याद आया, इस बेलन महाराज के तीसरे और ताजे ताजे पहलू के बारे में। ताजा इसीलिए क्योंकि ये पहलू अभी अभी मेरे समक्ष आया है। और इसी पहलू ने मुझे ये व्यंग्य लिखने के लिए प्रेरित भी कर दिया है। तो वाकया ये है कि कल सुबह से ही मेरी पीठ की एक नस ने मुझसे रूठ के जरा खिंच सी गई.. सो आज तक वो रूठी हुई है। 

दर्द के मारे हाल बेहाल, 

न नींद है और न करार..।

बस फिर क्या था, मेरी प्रिय पत्नी जी को भी मेरा दर्द सहन नहीं हुआ, और इस दर्द से मुझे निजात दिलाने के लिए तरह - तरह के दर्द निवारको के घरेलू उपायों की खोजबीन जारी हो गई। और इसी खोजबीन के चलते हमारे पड़ौस वाली भाभी जी ने भी एक नुस्खा हमारी मैडम जी को सुझा दिया, और बोल दिया कि पीठ सीधी कर के बेलन से बेल दो, नस जी जो रूठी हुई हैं मान के सही जगह पे आ जायेगी, फिर न तो दर्द होगा और न ही कोई पीड़ा.. बस फिर क्या था, पत्नी जी ने उठाया बेलन और चला दिया हमारी दुखती रग में.. और आप यकीन मान ही लीजिए कि दुखती नस जी कुछ देर के लिए तो मान गईं और मुझे दर्द से रिश्ता तोड़ना पड़ा। हालांकि ये दर्द इतनी जल्दी मुझसे अपना रिश्ता तोड़ेगा नहीं पर उम्मीद है कि कुछ न कुछ तो जरूर होगा और पत्नी जी की मेहनत रंग लाएगी। और इस तरह मेरे दर्द का अंत हो जाएगा। आखिर बेलन के तीसरे पहलू को भी तो अपना अस्तित्व कायम करना होगा न। मेहनत तो बेलन जी ने भी किया है।

खैर! ये दर्द तो ठीक हो ही रह है, आप जाइये और अपनी पत्नी जी के हाथों से घी चुपड़ी रोटियां खाइये। और सीमित रहें बेलन के पहले पहलू तक.. इसी आशा में..

आपका

महेश बारमाटे "माही"

Monday, 11 June 2018

Dhanno, Basanti aur Basant... (धन्नो, बसंती और बसंत)

नमस्कार दोस्तों!
बहुत दिनों बाद, कुछ दिल से... लिखने का मन किया... हालांकि मैं अक्सर दिल से ही लिखता हूँ, फिर भी आज सोचा आपसे साझा किया जाये तो बहुत अच्छा होगा। मेरे इस लेख के शीर्षक से आपको सुप्रसिद्ध हिन्दी फीचर फिल्म "शोले " की याद आ गई होगी। और शायद आप सोच रहे होगे कि मैं बीते जमाने की इस सुपरहिट फिल्म के बारे में कुछ नया या फिर कुछ घिसपिटा सा सुनाने वाला हूँ। तो दोस्तों! ऐसा कुछ भी नहीं है। 
मैं तो आदरणीय व्यंग्यकार, जिन्हे ब्लॉग जगत में सभी जानते हैं, श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी द्वारा रचित व्यंग्य संकलन "धन्नो, बसंती और बसंत" के बारे में अपना अनुभव आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। और सच कहूँ तो यह पहला व्यंग्य संकलन है जिसे मैंने पढ़ा है। हालांकि मैंने और भी कई किताबें पढ़ी हैं पर व्यंग्य पहली बार। 
इस किताब की शुरुआत में ही मुझे हास्य और व्यंग्य दोनों विधाओं में जो सूक्ष्म अंतर है वो समझ में आ गया। डेली हंट ई-बुक्स के एण्ड्रोइड एप के माध्यम से मुझे उनका यह संकलन पढ़ने को मिला। अभी कुछ दिन पहले ही मैंने यह किताब (ई- बुक) डाउनलोड की और अब भी पढ़ ही रहा हूँ, पर मुझसे रहा ही न गया कि पूरी किताब पढ़ने के बाद इसकी प्रशंसा करूँ। बस मन किया और आज आपके समक्ष हूँ मई। 
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी ने बड़े ही संजीदा तरीके से रोज़मर्रा की जिंदगी से संबन्धित विषयों पर व्यंग्य लिखा है, जिसे पढ़ कर आप भी एक बार सोचने जरूर लगेंगे की यार! ये बात मेरे दिमाग में क्यों नहीं आई। विषय की सूक्ष्मता और शब्दों का सही प्रयोग, श्री विवेक रंजन सर को बखूबी आता है। 
श्री विवेक रंजन सर के बारे में आप यूं तो जानते ही होंगे, पर तब भी एक सूक्ष्म सा परिचय देना तो लाज़मी भी है। अतः श्री विवेक रंजन सर जबलपुर के ही निवासी हैं, हाँ! जबलपुर के, जहां से मैं भी हूँ। और इतने साल बाद अप्रेल 2018 में उनसे मिलना हुआ, मिल के बहुत प्रसन्नता हुई कि जितने बड़े पद (मुख्य अभियंता) पर वे म॰ प्र॰ विद्युत मण्डल, जबलपुर में आसीन हैं, उतना ही सादगीपूर्ण स्वभाव और साहित्य के प्रति अपना सर्वस्व प्रदान करने वाले व्यक्तिव के धनी व्यक्ति हैं। जबलपुर की साहित्यिक संस्था में प्रांतीय अध्यक्ष पद पर आसीन श्री विवेक रंजन सर हमेशा साहित्य जगत के नए लोगों को प्रोत्साहित करने में बस लगे रहते हैं। आशा है उनकी रचनाओं को पढ़ने के बाद मुझे और आपको काफी कुछ सीखने को मिलेगा। और जरूर मिलेगा। 
अब आते हैं पुनः हम किताब की ओर - 
जैसा कि मैंने पहले ही आपको बता दिया है कि "धन्नो, बसंती और बसंत" किताब एक व्यंग्य संकलन है, जो कि रोज़मर्रा की जिंदगी से संबन्धित विषयों पर कटाक्ष करते हुये व्यग्यात्मक शैली में लिखी गई है। इसके प्रथम पृष्ठ से ही आप इस किताब में खो जाएँगे। और यदि आपको व्यंग्य पढ़ने का भी अगर शौक न हो तो भी एक अध्याय पढ़ने के बाद आपको लगेगा कि हाँ! सच में पढ़ने में मजा आ रहा है। इसीलिए मैं इस किताब को आपको पढ़ने के लिए ज़ोर डाल कर कहता हूँ कि कृपया एक बार तो पढ़ें जरूर। 
अब मैंने लिंक तो बताया भी नहीं... तो पढ़ेंगे कैसे ?
तो लिंक इस प्रकार है - 

बस 369 केबी की ई-बुक है और यूं तो 100 /- इसकी कीमत है पर डेली हंट पे फिलहाल 80% छूट के साथ केवल 20 /- रु मात्र में मिल रही है। आसानी से डाउन लोड भी हो जाती है। बस इसके लिए आपके गूगल प्ले स्टोर में आपको जाना होगा, डेली हंट बुक्स एप डाउनलोड करना होगा, अपना अकाउंट बनाने के बाद आप इस बुक को खरीद कर व्यंग्य की दुनिया का लाभ उठा सकते हैं। 
आशा है कि आपको मेरा ये लेख पसंद आया होगा। 
चलिये आप इस बुक को पढ़ना स्टार्ट करें, और मैं इसे पढ़ के पूरा करना..। 

- महेश बारमाटे "माही"

Wednesday, 5 April 2017

बड़े दिनों बाद...

आज बहुत दिनों बाद, जब ब्लॉगर की प्रोफ़ाइल देखने का ख्याल आया, तो देखने बैठ गया कि आखिर किन किन ब्लॉग में मैं कभी लिखा करता था। ऐसा लगा जैसे कई पुरानी डायरियों को अलमारी से आज निकाला हो। ऐसे कई ब्लॉग हैं, जो आज भी मेरे बगैर निरंतर लिखे जा रहे हैं, और ऐसे भी कुछ ब्लॉग मिले, जिनमे अब कोई नहीं लिखता। समय की कमी, न जाने कितने प्रतिभावान लेखको, कवियों को वक़्त की धुंध में पीछे छोड़ देती है। पर वक़्त चलता रहता है। निरंतर, हमेशा ही। 
शायद आपके मन में ख्याल आ रहा होगा कि आज कैसे मैंने लिखने की सोची ? कैसे इतने दिन बाद वापस ब्लॉगर खोल के अपने ब्लोगों को टटोला ? 
हुआ कुछ यूं, कि कल रात हमारे ऑफिस के ओफिशियल व्हाट्सएप ग्रुप में कुछ लोगों ने मुझे पढ़ा, और उनकी प्रेरणा से आज मैं इस मुकाम पर आया हूँ, के कुछ लिखने को मन करने लगा। 
आज बड़े दिनों बाद अपने फेसबुक पेज को देखा, लगा कि यार ये तो न जाने कब से बंद पड़ा है। उसे वापस चालू करने में कुछ परेशानियाँ थीं, तो सोचा एक नया पेज बना लूँ। तो लीजिये, एक नया पेज झटपट बना लिया। चलिये आज आया हूँ तो ये नई खबर दे ही दूँ। 


और एक दो पोस्ट भी डाल दी। 

चलिये, अभी चलता हूँ, अगली बार आऊँगा तो कुछ नया, जरूर ले कर आऊँगा। बस दुआ करना, कि बहुत जल्द आऊँ। 

आपका 

वही पुराना दोस्त 

महेश "माही"

Sunday, 20 September 2015

ये सफ़र, ज़िन्दगी है।

करीब 2 साल बाद.. आज फिर लिख रहा हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे लिखना भूल ही गया था। पर आज जो लिखने वाला हूँ, यक़ीनन आपको जरूर पसंद आएगा।

कुछ दिन पूर्व, मैं कुछ चिंताओं से घिरा हुआ था, सोच रहा था कि आखिर ये बुरे दिन कब जायेंगे। और बस यही सोचता, मैं अपनी बाइक से ऑफिस से घर की ओर आ रहा था। चूँकि बरसात के दिन हैं तो रास्ते बहुत ख़राब हो गए हैं। जगह - जगह पर रोड ख़राब हो गई है, जो सफ़र मैं 15 मिनट में तय करता था आज उसमे 30 मिनट से भी ज्यादा वक़्त लग रहा है। फिर ये रोज का ही रूटीन है मेरा।
ये 15 मिनट या 30 मिनट का रास्ता तय करते करते जब मैं अपनी समस्याओं के बारे में सोच रहा था तभी अचानक ये ख्याल आया कि ज़िन्दगी भी तो कुछ इस्सी रास्ते की तरह ही है। कहीं बिलकुल सीधी और सपाट सड़क, कहीं उबड़ खाबड़ टूटी हुई सड़क, कहीं हद से ज्यादा तीखा मोड़ लिए हुए तो कहीं कुछ और। इस सड़क पे हम हमेशा चलते रहते हैं। अगर टूटी उबड़ खाबड़ सड़क होती है तो संभल कर चलते हैं पल पल में अपनी गति और दिशा बदलते रहते हैं। अगर सड़क सपाट है तो भी तो हम अपनी गति और छोटे मोटे गड्ढों या अवरोधों से खुद को बचाते या सब कुछ इग्नोर करते हुए प्रतिदिन अपनी मंजिल तक पहुँचते हैं।
सफ़र छोटा हो या बड़ा। हम हर दिन एक मंजिल तय करते हैं। रोज ऑफिस जाना या ऑफिस से घर जाना। काम रोज का है मंजिल भी जानी पहचानी है और सड़क भी वही है पर हर रोज उसी सड़क पर एक ही स्पीड से एक ही तरीके से तो नहीं चलता मैं। हर रोज एक नए गड्ढे को इग्नोर करता हूँ कुछ अवरोधों से बचता हूँ। नए मुसाफिरों को देखता हूँ। फिर जा कर वही रोज वाला सफ़र तय करता हूँ।
अब इस सफ़र को ज़िन्दगी मान लूँ तो कुछ अवरोध / गड्ढे जिनसे मैं बचता हूँ वो दुःख हैं, जिनसे खुद को बचाता हूँ। कुछ गड्ढों को इग्नोर करते हुए मैं गाड़ी चलाता जाता हूँ वो ऐसे दुःख हैं जिनको इग्नोर कर देने से सफ़र में ज्यादा दर्द नहीं होता।
और सीधी सपाट रोड में भी तो मैं गाड़ी सीधी एक लकीर में नहीं चला पाता। तो कैसे मान लूँ कि ज़िन्दगी जो बिल्कुल दर्दरहित है वो भी बिना रास्ते से पल दो पल के लिए भटके ही गुजर जायेगी।
इस रोज के सफ़र ने मुझे, ज़िन्दगी का एक पाठ सिखा दिया कि ज़िन्दगी कभी भी सिर्फ सुख भरी नहीं है इसमें दुःख है, मोड़ हैं, रुकावटें हैं। जिन पर से हमें गुजरना है। अब ये बात अलग है कि इन दुखों को इग्नोर करना है, इन से बच के निकलना है, स्पीड मेंटेन कर के चलना है या जो हो रहा है उसे होते रहने देना है और जिस तरह रोड ख़राब होने पर हम शासन को दोष देते हैं उसी तरह जीवन के कुछ पल दुखदायी होने पर भगवान को दोष देना है।
बस हममे सही फैसला लेने का दम होना चाहिए। सफ़र अनजान ही सही, आखिर कट ही जाता है। बिलकुल ज़िन्दगी की तरह।

(पता नहीं क्या क्या लिख डाला मैंने, शायद आप कुछ समझ सकें।)

- महेश बारमाटे "माही"
20 सितम्बर 2015

Wednesday, 14 August 2013

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें ! (Happy Independence Day)

        स्वतंत्रता दिवस एक ऐसा दिन जो अमर शहीदों के बलिदान की याद दिलाता है। जो हमें भारतीय होने का एहसास दिलाता है। आज भी जब उन शहीदों के बलिदान की कहानी याद करता हूँ तो जरूर आँखों में अश्क आ ही जाते हैं। खैर ! ये दिन जितना अमर शहीदों को याद करने का है उतना ही सभी भारतीयों की जीत का जश्न मनाने का भी है। 
कल हम भारतीयों के लिए बहुत ही उत्साह वर्धक और गर्व से परिपूर्ण पर्व है -
          मैं जब छोटा था तो हर 15 अगस्त को मैं स्कूल सुबह - सुबह जाता और अपने स्कूल के प्रिन्सिपल सर को, घर में टीवी में अपने देश के प्रधानमंत्री को लाल क़िले में, और सरकारी दफ्तरों में विभाग प्रमुख द्वारा  अपना राष्ट्रीय ध्वज "तिरंगा" फहराते देखता तो गर्व महसूस करता था कि क्या किस्मत पाई है कि वो लोग अपना "तिरंगा" फहरा रहे हैं। ऐसे में उन लोगों के प्रति सम्मान की भावना और भी बढ़ जाती थी। और ये भी सोचता था कि वो भी खुद में कितना गर्व महसूस करते होंगे कि उन्हे ये सुनहरा मौका मिला है कि देश का तिरंगा इस पावन दिन के लिए फहराने मिल रहा है। 
          पिछली 15 अगस्त 2012 को जब पहली बार मुझे ये सौभाग्य मिला, तो मेरा सीना भी गर्व से फूल गया कि मैं तिरंगा फहरा रहा हूँ। वैसे मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं भी कभी अपने ऑफिस में तिरंगा फहराऊंगा... 
          पर किस्मत ने मुझे भी वही सम्मान दिया जिसकी मैं कल्पना दूसरों के लिए किया करता था या यूं कहूँ के खुद तिरंगे ने मुझे इसके लिए चुना है, फिर चाहे बहाना कुछ भी हो। 
कल 15 अगस्त 2013 को फिर मैं अपने ऑफिस मे तिरंगा फहराऊंगा तीसरी बार। सोच कर ही अजीब सी खुशी महसूस हो रही है। :)
तो दोस्तों !
         कल की कहानी कल सुनाऊँगा, हो सकता है कि हर रोज की तरह कल फिर कोई नया अनुभव मिले... 
जाते - जाते स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ बस इतना कहना चाहूँगा कि - 

वो मंज़र भी बड़ा अजीब होता है, 
जब कोई अपने देश के लिए शहीद होता है... 
यूं तो हर किसी को ये मुकाम नहीं मिलता माही !
देश पे मर मिटने वाला बहुत खुशनसीब होता है...

जय हिन्द दोस्तों !

Saturday, 23 March 2013

छूट या लूट ... ?

छूट ... 
छूट ...
छूट ...

इस छूट ने अच्छे - अच्छे सरकारी विभागों को आज लिया है लूट ... 

जी हाँ !
आज सरकार ने अपने ही कई विभागों में छूट का प्रावधान रख के उन विभागों के लिए नर्क के द्वार खोल दिए हैं। बस चंद वोट की खातिर आम जनता को पंगु तथा बेईमान बना रही है आज सरकार। मैं अन्य सरकारी विभागों के बारे में तो ज्यादा नहीं बता सकता मगर मैं जिस विभाग से हूँ उसमे तो सरकार ने तो हद कर के  रखी है। बिजली ... किसी भी देश, प्रदेश की रीढ़ की हड्डी कहलाती है क्योंकि बिन बिजली कोई भी देश विकास नहीं कर सकता, और आज के दौर में तो फसलें भी बिना बिजली के पैदा नहीं होती। और आज हमारे देश में अगर कोई प्रदेश सरकार गिरती है तो मुख्य मुद्दा बिजली का ही होता है। इसी कारण कुछ दिनों पहले हमारे प्रदेश के मुख्य मंत्री जी ने किसानो के बिलों पे सरचार्ज माफ़ कर के ५० % बिल माफ़ करने की घोषणा कर दी, जाने क्या सोचा और घोषणा कर दी। ये भी नहीं सोचा की ये मार्च है, वित्तीय वर्ष का अंतिम महिना। इसमें बिजली बिल माफ़ करने की घोषणा बिना किसी लिखित आदेश के करना बिजली के अधिकारीयों की कमर तोड़ देने के बराबर है। 
उधर उच्चाधिकारी ये चाहते हैं कि गत वर्ष जो बिजली के बिल जमा हुए थे, उससे कई गुना ज्यादा बिल इस बार आना चाहिए। अब जब सीएम साहब ने घोषणा कर ही दी तो क्यों कोई अपना पूरा बिल जमा करेगा ? 
और तो और जो व्यक्ति हर महीने अपना बिल जमा कर रहा है वो भी अब कहता है कि चोरों को रियायत और हमको कुछ भी नहीं ? ये कैसा न्याय है ? 
सच है ये, कि अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी से हर माह अपना बिल भरता आ रहा है तो उसे प्रोत्साहन के तौर पे कोई रियायत नहीं दी जाती, पर अगर कोई व्यक्ति जानबूझ कर या किन्ही कारणों से अपना बिजली का बिल नहीं जमा कर पता तो एक साथ जमा कर ने पर उसे छूट दी जाती है। 
कहते हैं की सुविधाएँ इंसान को नाकारा और पंगु बना देती हैं, और आज ऐसा ही कुछ भविष्य मैं इस देश को बनाने वाले किसानो का भी देख रहा हूँ। 
किसान छूट के चक्कर में बिल नहीं भरता, और नेता लोग ऐसे चोर, कामचोर, बेईमान किसानो को छूट पे छूट दे दे के वोट लिए पड़े हैं पर किसी ने भी ये नहीं सोचा कि इन छूट की योजनाओं से, बेतुकी व बेबुनियादी घोषणाओं से किस का भला कर रहे हैं ? इस देश का या खुद का ?

- इंजी० महेश बारमाटे "माही"