क्या आज ५५ साल बाद भी भारत में जातिवाद ख़त्म हुआ है ?
२४ मई १९५६, ये वो ऐतिहासिक दिन था जिस दिन डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को सारे भारत के सामने अपनाया. डॉ. भीमराव अम्बेडकर इनका नाम तो सबने सुना होगा. ये वही शख्स है जिसने हमारे देश के संविधान को एक रूप प्रदान किया था, शायद अब आपको याद आ गया होगा. अब भी ना आया हो तो एक बात और बताना चाहूँगा कि ये वही युग पुरुष हैं जिन्होंने भारत में शूद्र कही जाने वाली "महार" जाति को इस हिन्दू समाज में रहने लायक अधिकार दिलाये. आज सारा बौद्ध समाज उनको याद करता है और उनका आभारी है. उन्होंने एक सपना देखा था कि कोई भी महार या कोई भी नीची जाती वाला व्यक्ति इस हिन्दू प्रधान देश में सिर उठा कर जीये. कहीं कोई जाति के नाम पर छुआछूत न हो. अगर गाँधी जी ने अखंड भारत का सपना देखा था तो उस सपने का एक भाग ये भी था कि भारत में न केवल हिन्दू मुस्लिम एकता हो बल्कि जातिवाद, धर्मवाद भी न हो. यही सपना डॉ. भीमराव अम्बेडकर का भी था. और इस हेतु उन्होंने जो अविस्मर्णीय कार्य किये वो अद्वितीय हैं. पर क्या आज ५५ साल बाद तक भारत में जातिवाद ख़त्म हुआ है ? शायद आपका जवाब हाँ होगा. पर मेरा जवाब ...