Saturday, 30 April 2011

मेरी बात

दोस्तों और हिंदी ब्लॉग जगत के गणमान्य ब्लोग्गर्स...

आज कुछ भी लिखने से पहले मैं आप सभी को प्रणाम करता हूँ और आप सबसे ये कहना चाहता हूँ कि अगर मेरे इस लेख में मैंने कुछ भी ऐसा लिखा हो जिससे आपको दुःख हो तो कृपया मुझे क्षमा करें.

दोस्तों, मैंने हमेशा से चाहा है कि मैं यहाँ जो भी कहूं विनम्रता पूर्वक ही कहूं पर फिर भी कभी कभी गलती हो ही जाती है... आखिर मैं भी उस ईश्वर का बनाया हुआ एक आम इंसानी बच्चा हूँ जिसके एक कारण मैं, आप और ये सारी कायनात आज तक अस्तित्व में हैं. जैसा कि आप सभी जानते हैं कि इन्सान गलतियों का पुतला है अगर वो गलती नहीं करेगा तो और कौन करेगा ? और मैं तो अब भी बच्चा ही हूँ और हमेशा बच्चा ही रहना पसंद करता हूँ.

कल मैंने एक लेख लिखा था "सुझाव : Blogging के बेहतर कल के लिए" और इस बार मुझे आशा से भी ज्यादा कमेंट्स मिले ये जान कर मुझे ख़ुशी और दुःख दोनों हुआ... ख़ुशी इस बात की कि ब्लॉग जगत के कुछ बड़े दिग्गजों ने मेरा लेख पढ़ा और गम इस बात का कि उनमे से कुछ ने मेरे सुझावों पर ध्यान न देते हुए मेरे लेख के एक शब्द को कुछ इस तरह से पकड़ लिया कि मैं जैसे कुछ जानता ही नहीं हूँ. हाँ मैं सब कुछ तो आज तक नहीं जानता पर ऐसा भी नहीं है कि वर्तमान को मैं देख के समझ भी नहीं सकता. और तब भी मैंने सबके कमेंट्स में पूछे अप्रत्यक्ष शंकाओं व प्रश्नों का अपनी क्षमतापूर्वक जवाब देने का प्रयास भी किया है. आशा करता हूँ कि सबको मेरा सुझाव तथा मेरे उत्तर पसंद आये होंगे...

मैं इस ब्लॉग्गिंग जगत में आज भी नया ही हूँ. पर बहुत कम समय में मैंने ब्लॉग जगत को जानना शुरू कर दिया है. पहले जब मैं कवितायेँ, ग़ज़ल वगैरह अपने ब्लॉग पे लिखा करता था तो सबने मेरे कार्य की प्रशंसा की. और आज जब मैंने अपने दिल में उठे कुछ सुझाओं को ब्लॉग जगत को देना चाहा ताकि ब्लॉग जगत के द्वार का पता उन लोगों को भी चले जो लिखना तो जानते हैं पर सही मार्गदर्शन, इन्टरनेट की कम जानकारी तथा अपने बड़ों के दबाव के चलते वो अपना ब्लॉग बना नहीं पाते... क्षमा करें पर ये बात सच है, मेरे कॉलेज कुछ ऐसे दोस्त थे जो मुझसे कहीं ज्यादा बेहतर लिखते थे पर सही मार्गदर्शन, इन्टरनेट की कम जानकारी तथा कुछ के अभिभावकों की नासमझी के चलते या तो उन्होंने लिखना बंद कर दिया या वो अपनी लेखन कला को गुमनामी के अंधेरों के पीछे छिपा दिया और कुछ ने आज तक अपने दोस्तों के अलावा और किसी को बताया ही नहीं कि वे भी लिखते हैं.

मैंने ऐसे भी कुछ लोगों को देखा है जो अपनी मन की व्यथा को अपने अन्दर ही छिपा ली है और घुट घुट के मरने पर मजबूर हैं क्योंकि भारत में ऐसे कई छोटे शहर (गाँव और कसबे भी) हैं जहां की बातों को लिख कर व्यक्त करने की कला को हर वक्त कुचला जाता है. और ये सब सहने वाले अधिकांश किशोर (१३ से १९ वर्ष) वर्ग के लोग ही होते हैं. क्योंकि हमारे यहाँ बच्चों की अपनी ज़िन्दगी मेरा मतलब है कि उनकी प्राइवेट लाइफ है ही नहीं. डायरी राइटिंग के बारे में तो किशोर वर्ग सोचता ही नहीं क्योंकि हमारे यहाँ किशोरों कि अपनी कोई गोपनीयता होती ही नहीं.

यही सब देख कर, जान कर जब मैंने कुछ सुझाव ब्लॉग जगत को दिए तो कुछ ने मेरे सुझावों को सही माना और कुछ ने इसे छोटा मुंह व बड़ी बात ही समझी. अरे ! लोग ये क्यों भूल जाते हैं कि हम यूथ में जो जोश है उसे बस एक सटीक मार्गदर्शन की जरूरत है, बाकी तो हम दुनिया की काया ही बदलने का हौसला रखते हैं... अगर ऐसा न होता तो हिंदुस्तान के सफल मुग़ल सम्राट ज़िलालुद्दीन मोहम्मद अकबर महज १३ वर्ष की आयु में सम्राट न बनते. उनकी छोडो मैंने सुना है कि जिस वक्त अभिमन्यु कौरवों का चक्रव्यूह  तोड़ने निकले थे उस वक्त वो भी १३ वर्ष के थे.  आखिर जब एक १३ वर्षीय बालक जब चक्रव्यूह को तोड़ने का प्रयास कर सकता है (भले ही वह नाकाम हुआ हो) तो मैंने तो २२ वर्ष की उम्र में बस कुछ सुझाव देना चाहा. खैर छोडो मैं भी किनकी बात लेकर बैठ गया, ये तो हमारे देश में बहुत पहले से चला आ रहा है कि अपने से छोटो की बातों को नज़र-अंदाज कर दिया जाता है, हमारे बड़े हमसे सम्मान चाहते हैं पर हमे सम्मान कोई नहीं देना चाहता. वे अपनी बात हम पर लागु करना चाहते हैं पर हमारी बात सुनना नहीं चाहते.

क्योंकि वो जानते हैं कि हम में इतनी काबिलियत है कि हम उनके साथ कंधे से कन्धा मिला के चल सकते हैं पर ये बात हर बड़े को बुरी लगती है... इसीलिए आज मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि हमारी बातों को एक बार तो दिल से सुन के देखें, उन बातों पर ठन्डे दिमाग से गौर फरमाइए और फिर अगर आपको उसमे कहीं कोई गलती हो तो वो हमे बताएं, हमारा मार्ग दर्शन करें पर हमें उपेक्षित न करें... क्योंकि जिसे चोट लगती है उसे ही दर्द का सही मूल्य पता होता है... 

आज मुझे पता है कि मेरा ये पोस्ट पढने के बाद या तो लोग मुझे Ignore करना शुरू कर देंगे, या वो फिर मुझ पर कटाक्ष करते हुए (या मुझे बच्चा समझते हुए) मुझे समझाने की कोशिश जरूर करेंगे...

हे प्रभू ! मुझे माफ़ करें अगर मैंने किसी व्यक्ति विशेष के दिल को थोड़ी भी चोट पहुंचाई हो...

धन्यवाद !

- महेश बारमाटे "माही"
30th April 2011

कृपया कर के एक नज़र यहाँ भी दौडाएँ -

Friday, 29 April 2011

सुझाव : Blogging के बेहतर कल के लिए


आज नवोदित ब्लोगर्स की क्या स्तिथि है इस नवोदित, विकास शील ब्लॉग जगत में ?

मुझे ब्लॉग जगत में आये ज्यादा वक्त न गुजरा होगा, और मैं भी इसके रंग में रंगने लगा. अपनी पोस्ट को बढ़ावा देने मैंने भी कई एग्रीगेटर का सहारा लेना शुरू कर दिया. आखिर हर नया ब्लौगर यही तो चाहता है कि उसकी पोस्ट को सब पढ़ें और वो मशहूर हो जाए. और इसी कारण मैंने भी बहुत प्रयत्न किये ताकि मैं भी लोगों की नज़रों में आ जाऊँ... और देखो मैं अपने उद्देश्य में थोडा ही सही सफल तो हो ही रहा हूँ. पर इस ब्लाग जगत में इतनी जल्दी नाम पा लेना सबके बस की बात नहीं. मैंने भी करीब एक साल से ज्यादा का लम्बा इंतजार किया.  और आज न जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि मैंने तो अपने मुकाम की पहली सीढ़ी तो पा ली पर क्या और भी लोगों को मेरी ही तरह सफलता मिली ? ये इंसानी फितरत है कि अगर कोई नया काम वो करने जाए तो सबसे पहली उसकी मनोकमाना यही रहती है कि अगले दिन ही उसे अपने उस काम का सही फल और वह भी बड़ी अच्छी तादाद में मिले. इसी बीच मैंने अपने २३वें जन्मदिन पे एक फिल्म देखी F.A.L.T.U. फिल्म की कहानी बहुत अच्छी लगी मुझे... Don't worry मैं आपको फिल्म की स्टोरी नहीं सुनाने वाला, मैं तो बस इतना कहना चाहता हूँ कि इस फिल्म को देखने के बाद मुझे realize हुआ कि हमारा education system कितना लापरवाह है, आज हर कोई इंजिनियर, डॉक्टर इत्यादि बनना चाह रहा है. क्योंकि हमारे schools में ये कभी नहीं सिखाया जाता कि बेटा तेरे अन्दर ये प्रतिभा है और तू इस ओर भी थोड़ा ध्यान दे. और इसी कारण अक्सर नवयुवक लेखन को कॉलेज में या उसके बाद ही अपनाते हैं. 
डॉक्टर, इंजिनियर तो आज हर कोई बन रहा है और आप शायद ना मानें जहां मैं रहता हूँ उस बिल्डिंग में ६ इंजिनियर रहते हैं. और उन ६ में से केवल दो ही ऐसे हैं जो कवितायें लिखते हैं, और उन दो में से एक मैं भी हूँ जो कविता के साथ साथ लेख, कहैं इत्यादि भी लिखता हूँ. यहाँ मैं अपनी बधाई नहीं कर रहा. बस इतना कहना चाहता हूँ कि मैं जिस शहर (जबलपुर) में रहता हूँ वो आज भी पूरी तरह से जागरूक नहीं. यहाँ के लोग अपने बच्चों को इंजिनियर तो बनाना चाहते हैं पर लेखक या कवि नहीं. चाहे उनके बच्चे में कितनी भी प्रतिभाएं क्यों न छिपी हों... यहाँ मैं सिर्फ लेखन के क्षेत्र विशेष की बात इसीलिए कर रहा हूँ क्योंकि ये क्षेत्र ही मेरे हिसाब से ज्यादा अछूता है आज. आज लोग दूसरे देश के लोगों की किताबें पढ़ते हैं, उनकी किताबों को दूसरों को पढने की प्रेणना देते हैं, बड़े शायरों की शायरियों को SMS में एक दूसरे को भेजते हैं पर कोई ये नहीं चाहता कि वो भी कुछ लिखे. अपना या अपने प्रियजन का नाम दुनिया के सामने साबित करें.

और इसीलिए आज मैं ब्लॉग जगत के बड़े बड़े दिग्गजों को कुछ सुझाव देना चाहता हूँ. और वो सुझाव कुछ इस तरह हैं - 

  • आज भी हमारे देश के ऐसे कई शहर व गाँव हैं जहाँ इन्टरनेट तो हर कोई जनता है पर वो ब्लॉग्गिंग या लेखन के प्रति जागरूक नहीं हैं, बहुत से लोगों को ब्लॉग्गिंग के बारे में जानकारी ही नहीं है. इसीलिए मेरा सुझाव है कि 
  1. सारे देश में हिंदी लेखन, हिंदी क्रियेटिव राइटिंग तथा हिंदी ब्लॉग्गिंग के लिए हर छोटे - बड़े  शहर, कस्बे तथा गाँव के सभी छोटे बड़े स्कूल व कॉलेज में छोटे छोटे Workshops तथा सेमीनार आयोजित करना चाहिए.
  2.  छोटे व बड़े स्तर पर हिंदी लेखन सम्बंधित प्रतियोगिताएं आयोजित की जाए.
  3. हर प्रतियोगी व वर्कशॉप में आने वाले प्रतिभागी को अखिल भारतीय स्तर का प्रमाण पात्र दिया जाए.
  4. अगर हो सके तो प्रोत्साहन राशि का भी इन्तेजाम किया जाए.
  5.  और वर्ष में एक बार इन अलग अलग स्थानों से चुने गए शीर्ष प्रतियोगियों को हिंदी साहित्य लेखन जगत की सम्मानित  हस्तियों द्वारा सम्मानित भी किया जाए.
  6. और एक पुस्तक का भी विमोचन किया जाए जिसमे उन प्रतिभागियों की ही लिखी गई रचनाएं हों. 
  • अब बात आती है इन सबमे लगने वाले धन की. तो उसके लिए भी मेरे पास सुझाव है कि जो वोर्क्शोप या प्रतियोगिता आयोजित की जाए उनमे भाग लेने वाले प्रतिभागियों से ही कुछ राशि ली जाए और उन पर ही खर्च किया जाए.
  • हमारे देश में लाखों स्वयं सेवी संस्थाएँ हैं, इस हेतु उनकी भी मदद ली जाए...
ऐसा नहीं है कि ये काम मैं अकेला शुरू नहीं कर सकता, पर इस काम के लिए मुझे समय - समय पर सही मार्गदर्शन करने वालों की जरूरत होगी. सभी आयोजनों के लिए धन राशि की भी आवश्यकता होगी. और सबसे महत्वपूर्ण समय की भी आवश्यकता भी होगी. चूंकि मैं अभी एक बेरोजगार नौजवान व नवोदित ब्लोगर हूँ तो मेरे लिए सब कुछ कर पाना थोड़ा नामुमकिन सा लगता है... 
और जहाँ तक मैं समझता हूँ कि हिंदी ब्लॉगर जगत के वरिष्ठ ब्लौगर पूरी तरह से इस कार्य हेतु सक्षम हैं, तो कृप्या कर मेरे इस सुझाव को आप सारे हिंदी ब्लॉगर जगत के हर फोरम, हर ब्लॉगर असोसिएशन इत्यादि के सामने प्रस्तुत करें और मेरी सोच को आगे तक पंहुचने का कष्ट करें...

मैं नहीं चाहता कि ब्लॉग जगत के नवोदित सितारे तथा कुछ गुमनाम नौजवान कवि व लेखकों की रचनाएँ बस उनकी डायरी तक ही सीमित रह जाए... और हाँ एक और बात इस कार्य में कृपया भ्रष्टाचार व भ्रष्ट लोगों की मदद लेने के बारे में सोचे ही न, चाहे वो कितना भी बड़ा नेता हो या कोई दिग्गज ब्लोग्गर...

धन्यवाद !

अधिक जानकारी के लिए मुझसे संपर्क करें - 

महेश बारमाटे "माही"

और मेरे ब्लॉग को फौलो कर के मेरा हौसला बढायें... 

Thursday, 28 April 2011

हर आशिक लिखता नहीं...

        दोस्तों जब मैं कॉलेज के फर्स्ट इयर में था, तब मैंने लेखन ले क्षेत्र में कदम ही न रखा था... साल २००७ की शुरुआत में या २००६ के अंत से मैंने लिखना शुरू किया होगा... और २००७ के मध्य तक मैं अपनी क्लास में मशहूर हो गया था... के कारण तो बस मेरा लेखन था और दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण कारण था मेरा लेखन का विषय. उस वक्त मैं अधिकांशतः प्यार से सम्बंधित लेख, कविता, शायरी वगैरह लिखता था. इसी कारण लोगों ने ये सोचना शुरू कर दिया कि महेश जरूर किसी से प्यार करता है तभी वो बस प्यार के बारे में ही लिखता है... और ये बात सुन कर मुझे हँसी आती थी. क्योंकि ये लेखन की कला मुझे भगवान की ओर से उपहार के रूप में मिली है और मुझे ही नहीं मेरे दोनों बड़े भाइयों को ये कला प्राप्त है. 
       और तब मैंने उनका ये भ्रम तोड़ने की मन में ठानी और फिर एक लेख लिख डाला. और आज मैं अपनी लेखों वाली नोट बुक से वही लेख आपके समक्ष प्रस्तुत करने आया हूँ. तो चलिए शुरू करता हूँ अपना लेख - 

      जैसा कि मैंने आपको बताया कि कुछ लोग ये सोचते हैं - "जो लोग 'प्यार' से सम्बंधित लेख, कवितायें या शायरियाँ लिखते हैं, वे भी किसी से मुहब्बत करते हैं या कभी न कभी उन्होंने भी किसी न किसी से प्यार जरूर किया होगा तभी तो इस बारे में इतना सोच पाते हैं". और हाँ ये विचार ज्यादातर किशोरों के मन में ही अक्सर आते हैं. पर मेरा मानना है कि ऐसा बिलकुल ही नहीं है, मेरा मतलब ये नहीं कि जो लोग प्यार - मुहब्बत से सम्बंधित लेख लिखते हैं वो किसी से भी प्यार नहीं करते, पर सभी एक से नहीं होते. ये तो बस लिखने वाले की सोच पर निर्भर करता है कि वह क्या महसूस कर रहा है, वह क्या लिखना चाहता है और उसने अपने आसपास क्या देखा जिस पर वो लिखना चाहता है. 
      हर व्यक्ति को उसके आसपास का वातावरण बहुत प्रभावित करता है. कभी - कभी हम (लेखक या कवि) किसी व्यक्ति से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि उनकी बातें या वे जो महसूस करते हैं उसी को स्वयं महसूस करके, अपने तथा उनके विचारों को अपनी कहानियों, कविताओं तथा लेखों में व्यक्त करते हैं. और हर लिखने वाले की दूरदृष्टि इतनी अच्छी होती है कि वे वह बात भी सोच लेते हैं जो आमतौर पर हर कोई नहीं सोच पाता. हम, लिखने वाले, तो किसी के भी विचारों, जिनसे हम अच्छी तरह वाकिफ हैं, को भी अपने लेखों, कविताओं में शामिल कर सकते हैं. कभी कभी हम किसी आशिक के दिल के हाल को ही बयान कर देते हैं तो कभी किसी निर्जीव वस्तु के दिल का हाल भी बता सकते हैं और अगर मन में कुछ न आया तो किसी alien (परगृह वासी)  की व्याख्या तक बखूबी कर सकते हैं जिसे हमने तक सपने में तक न देखा हो, ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं जहां सिर्फ प्यार हो, खुशियाँ हो.. ऐसी दुनिया जिस पर आज के वैज्ञानिक जा कर बसने की सिर्फ परिकल्पना कर सकते हैं. पर हम लेखक / कवि लोग ऐसी दुनिया में जब चाहे कदम रख सकते हैं भले इंसान सच में वहाँ हजारों सालों बाद ही या शायद कभी भी कदम न रखे. 
और मेरी ये बात इन पंक्तियों से सार्थक होता है - 

जहां न पहुँचे रवि,
वहाँ पहुँचे कवि...

       बस इसी कारण, एक लेखक या कवि किसी भी विषय पर जब चाहे लिख सकता है, चाहे वो विषय "प्यार" ही क्यों न हो ? और ये सब लिखने के लिए उसे प्यार करना जरूरी भी नहीं होता. वैसे मेरी माने तो कोई भी किसी भी विषय पर लिख सकता है, जैसे मैंने लिखने की शुरुआत की.
      अगर आपको भी लगता है कि प्यार को describe करने के लिए प्यार करना जरूरी है तो ये विचार अपने मन से निकाल ही दें तो बेहतर होगा, क्योंकि हर प्यार करने वाला लेखक, कवि या शायर नहीं होता.

      अब समझता हूँ कि शायद आपको मेरी बात समझ में आ ही गई होगी और आप इससे सहमत भी होंगे. और यदि कोई बात, फिर भी समझ में न आये, तो मैं हूँ न ... हर दम आपके ही लिए...

आपका 
महेश बारमाटे



Monday, 25 April 2011

पञ्च-शील : गौतम बुद्ध की शिक्षाएं

नमस्कार दोस्तों !

लो आज फिर मैं आ गया. देरी के लिए क्षमा करें क्योंकि मैं किसी काम से बहार गया हुआ था.
जैसा कि मैंने अपने पिछले लेख में कहा था कि मैं आपको बौद्ध धर्म के पञ्च-शील की जानकारी दूँगा, तो लो मैं आज वही ले कर आया हूँ.

यूँ तो लोग बौद्ध धर्म के इन तीन प्रमुख मन्त्रों को जानते ही हैं - 

बुद्धम शरणम् गच्छामि.
धम्मम शरणम् गच्छामि.
संघम शरणम् गच्छामि.

और शायद इनका मतलब भी जानते हैं फिर भी बता देता हूँ - 

मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ.
मैं धर्म की शरण में जाता हूँ, 
मैं संघ की शरण में जाता हूँ.

इन तीन प्रमुख मंत्र शरण - शील कहलाते हैं और इनके अलावा गौतम बुद्ध ने जब अपनी शिक्षाएं सबको देनी चाही तब उन्होंने पञ्च - शील का निर्माण किया. ये वो पांच वचन हैं जो लगभग हर बौद्ध धर्म का अनुयायी जानता है. और इन पञ्च - शील का उच्चारण हर धार्मिक अनुष्ठान के वक्त किया जाता है. ये पञ्च - शील हैं  -
  1. पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी - मैं जीव हत्या से विरत (दूर) रहूँगा, ऐसा व्रत लेता हूँ.
  2. अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी - जो वस्तुएं मुझे दी नहीं गयी हैं उन्हें लेने (या चोरी करने) से मैं विरत रहूँगा, ऐसा व्रत लेता हूँ.
  3. कामेसु मिच्छाचारा  वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी - काम (रति क्रिया) में मिथ्याचार करने से मैं विरत रहूँगा ऐसा व्रत लेता हूँ.
  4. मुसावादा वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी - झूठ बोलने से मैं विरत रहूँगा, ऐसा व्रत लेता हूँ.
  5. सुरामेरयमज्जपमादट्ठाना वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी - मादक द्रव्यों के सेवन से मैं विरत रहूँगा, ऐसा वचन लेता हूँ.
ये पांच वचन बौद्ध धर्म के अतिविशिष्ट वचन हैं और इन्हें हर गृहस्थ इन्सान के लिए बनाया गया था शायद इसी कारण मैंने अक्सर इन पञ्च शील का उच्चारण करते हुए बौद्ध धर्म के अनुयायियों को देखा है. पर विडंम्बना ये है कि करीब 80 - 95 % लोगों को इन पञ्च - शील का अर्थ शायद ही पता हो. अतएव मैंने आज इन पञ्च शीलों को अर्थ समेत यहाँ हिंदी ब्लॉग जगत में ले कर आया हूँ ताकि लोग न केवल इन का उच्चारण करें बल्कि अर्थ समेत अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी करें. ये पञ्च - शील प्राचीन पाली भाषा में हैं और मैं इतना ज्ञानवान अभी नहीं हुआ हूँ कि इनका अनुवाद कर सकूँ, इसी कारण मैंने इनका अनुवाद एक बड़ी लोकप्रिय पुस्तक मिलिंदपंह (मिलिंद प्रश्न)  से लिया है. 

संकलन - मिलिंदपंह (मिलिंद प्रश्न) 
अनुवादक - भिक्खु जगदीश काश्यप

मेरा प्रयास है कि ज्यादा से ज्यादा लोग जो आज भारत में बौद्ध धर्म अपना चुके हैं या इसकी ओर आकर्षित हैं वो बुद्ध की शिक्षाओं को अच्छी तरह समझें ओर अपने जीवन में इन्हें उतारने की कोशिश करें  तथा मेरा यह भी प्रयास रहेगा कि चाहे वो किसी भी धर्म के, जाति के या समुदाय के हों, गौतम बुद्ध की शिक्षाएं भारत के हर नागरिक तक पहुंचे.
आशा करता हूँ कि मेरे इस प्रयास से किसी के भी मन मस्तिष्क को किसी भी प्रकार से ठेस नहीं पहुंचेगी.

और आशा करता हूँ मेरा प्रयास मुझे सफलता प्रदान करे...

भवतु सब्ब मंगलं

महेश बारमाटे
25th April 2011


Sunday, 17 April 2011

क्या आज ५५ साल बाद भी भारत में जातिवाद ख़त्म हुआ है ?




२४ मई १९५६, ये वो ऐतिहासिक दिन था जिस दिन डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को सारे भारत के सामने अपनाया. डॉ. भीमराव अम्बेडकर इनका नाम तो सबने सुना होगा. ये वही शख्स है जिसने हमारे देश के संविधान को एक रूप प्रदान किया था, शायद अब आपको याद आ गया होगा. अब भी ना आया हो तो एक बात और बताना चाहूँगा कि ये वही युग पुरुष हैं जिन्होंने भारत में शूद्र कही जाने वाली "महार" जाति को इस हिन्दू समाज में रहने लायक अधिकार दिलाये. आज सारा बौद्ध समाज उनको याद करता है और उनका आभारी है. उन्होंने एक सपना देखा था कि कोई भी महार या कोई भी नीची जाती वाला व्यक्ति इस हिन्दू प्रधान देश में सिर उठा कर जीये. कहीं कोई जाति के नाम पर छुआछूत न हो. अगर गाँधी जी ने अखंड भारत का सपना देखा था तो उस सपने का एक भाग ये भी था कि भारत में न केवल हिन्दू मुस्लिम एकता हो बल्कि जातिवाद, धर्मवाद भी न हो. यही सपना डॉ. भीमराव अम्बेडकर का भी था. और इस हेतु उन्होंने जो अविस्मर्णीय कार्य किये वो अद्वितीय हैं.
पर क्या आज ५५ साल बाद तक भारत में जातिवाद ख़त्म हुआ है ?

शायद आपका जवाब हाँ होगा. पर मेरा जवाब "" है.
हाँ, ये जरूर कहा जा सकता है कि जातिवाद कम हुआ है पर जड़ से ख़त्म नहीं. आज हमारे देश का दलित वर्ग या ये कहिये हमारे देश का "महार" वर्ग या बौद्ध वर्ग, शिक्षित संपन्न और कुछ हद तक आत्म निर्भर जरुर हो गया है और ये डॉ. भीमराव अम्बेडकर के कार्यों की बहुत बड़ी उपलब्धि भी है. पर आज भी भारत के ऐसे कई भाग हैं जहाँ बौद्ध लोगों को, हरिजनों को तथा अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को घृणा की नज़रों से देखा जाता है. उनसे दूर से ही बात की जाती है. उनके घर में घुसना या उनके घर का पानी पीना भी पाप है. कुछ ग्रामीण इलाकों में ये हाल है कि वो अगर किसी हैण्ड पम्प पे चले जाए पानी के लिए तो वहाँ पर अगर को हिन्दू जाति का इंसान होगा तो वो अपना सारा पानी फेंक देगा, और जब तक कि वो महार चला न जाए तब तक वहाँ कोई और नहीं आएगा. और फिर क्या है उनके जाने के बाद ही फिर से बाल्टी को माँज कर फिर पानी भरा जाएगा. अब आप ही कहिये क्या सच में जातिवाद इस देश से जा चुका है ? ये कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं थी, ये एक सच्ची घटना थी जिसे मेरे बड़े भाई ने खुद देखा, महसूस किया और सहा है. और मैंने भी अपने दोस्तों के बीच इस बात को महसूस किया है. और मुझे यकीन है कि हर SC या ST जाति के इन्सान ने जीवन में कम से कम एक बार जरूर इस बात को महसूस किया होगा.

आज मुझे गर्व है कि मैं बौद्धिस्ट हूँ. पर इस बात का दुःख भी कि जो धर्म हमारे भारत देश की अपने धरती से जन्म लिया उसे आज भी भारत में घृणा की नज़रों में देखा जाता है. मैं किसी धर्म की बुराई करने या बौद्ध धर्म की अच्छाईयाँ बताने नहीं आया यहाँ. बल्कि इस लिए आया हूँ कि वे लोग जो खुद को बौद्ध समाज का ठेकेदार समझते हैं वो इस बात को जाने कि हम आज भी हरिजन ही हैं. और एक बात ये भी जान लें कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी को हरिजन शब्द से नफरत थी. आज बौद्ध समाज काफी शिक्षित हो गया है, पर अज्ञानता अब भी हम पर हावी है. अगर मेरी बात से सहमत न हो तो कृपया कर बौद्ध धर्म के पंचशील का अच्छी तरह पाठ करें और उनका हिंदी में मतलब जानने कोशिश भी करें. अगर मतलब पता चल जाए तो फिर एक बार अपने अंतर्मन में झाँक कर देखें कि क्या आप पंचशील का पालन करते हैं ? मैं ये इसीलिए कह रहा हूँ ताकि अगर आपने खुद को सुधार लिया तो समाज को और फिर देश को सुधरने में देर नहीं. गौतम बुद्ध ने भी कहा है कि मन कि बुराइयों को मारो, तभी सारे समाज का उद्धार होगा. 

अगर जातिवाद ख़त्म करना है तो पहले खुद तो सुधरो तब समाज और दुसरे समाज पर ऊँगली उठाने लायक बन पाओगे...

आशा है कि लोगों को मेरी बात समझ में जरूर आएगी.
अगली बार मैं बौद्ध धर्म के पंचशील की शिक्षा के साथ आऊंगा, तब तक के लिए मुझे आज्ञा दें... 

महेश बारमाटे
१७ अप्रेल २०११ 

Friday, 15 April 2011

F.A.L.T.U.

नमस्कार दोस्तों !

आज फिर मेरा मन कुछ लिखने को कह रहा है. आखिर आज मैं अंतरजाल (इन्टरनेट) पे अपना समय बिता ही रहा हूँ जैसा कि अक्सर यूँही फालतू बैठ के बिताता हूँ. फालतू से याद आया, १२ अप्रेल २०११, को मेरा जन्मदिन था. तो मैंने सोचा कि क्यों न इस दिन को यादगार बनाया जाए, और ऐसा सोचना जायज़ भी है, तो मैंने अपने कुछ दोस्तों के संग सुबह-सुबह निकल पड़ा कोई मूवी (फिल्म) देखने.

हम लोग सिनेमा पहुंचे तो सब ने सोचा क्यों न "फालतू" (F.A.L.T.U.) फिल्म ही देख ली जाए. बस फिर क्या था हमने टिकेट ले ली और फिल्म देखने लगे. जैसा कि आप शायद जानते हैं कि ये फिल्म उन छात्रों के जीवन पर आधारित है जिनके कभी अच्छे marks आये ही नहीं. इस फिल्म में कुछ इसी तरह के छात्र मिल के एक फर्जी कॉलेज खोल लेते हैं जहाँ वो हर चीज सिखाई जाती है जो वो लोग सीखना चाहते हैं. कॉलेज में कोई शिक्षक नहीं था, पर जब उनको शिक्षक की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने उन शिक्षकों की शिक्षा को ही अपने कॉलेज में ले आये और फिर क्या था ? उस कॉलेज के सारे के सारे छात्रों (जो कि दुनिया की नज़र में बस useless या कबाड़ थे) में से हुनर के हीरों की बरसात सी होने लगी.

मैं यहाँ उस फिल्म की बधाई करने के लिए नहीं आया, बस इतना कहना चाहता हूँ कि किसी ने आज तक सचमुच का ऐसा कोई शिक्षण संस्थान खोलने की जरूरत महसूस क्यों नहीं की? जहाँ वही पढाया जाए जिसमे छात्र की रूचि हो न कि अभिभावक की. हर इन्सान अपना Best दे सकता है, पर जरूरी नहीं कि सिर्फ पढ़ाई में ही  दे. 

अंत में बस इतना कहना चाहूँगा कि हमारे Education System को बदलाव की जरूरत है... और इस विषय पे बहस की भी...

No one is useless here, so never use less any one.

Mahesh Barmate
15th April 2011

Saturday, 2 April 2011

बदलाव ही ज़िन्दगी है...

        ज़िन्दगी में कभी - कभी हर किसी को अपने स्वाभाव को बदलना पड़ता है. वैसे.., इन्सान का स्वाभाव change हो जाना आम बात है और इसके कई कारण हो सकते हैं. जब किसी का स्वाभाव स्वतः ही change हो जाये, जैसे कि अचानक मिली सफलता या विफलता के कारण. कभी कभी समय के साथ हमारा स्वाभाव भी यूँही बदल जाता है हम इस अचानक आये परिवर्तन को काबू में नहीं रख पाते, शुरू में कोशिशें जरूर करते हैं मगर, किस्मत के आगे किसकी चलती है ? क्योंकि "परिवर्तन ही तो प्रकृति का नियम है".
         ये तो रही बात हमारे स्वाभाव के स्वतः परिवर्तन की, पर अगर जब हम खुद को बदलना मतलब अपने स्वाभाव में जबरदस्ती बदलाव लाना चाहते हैं, तो हम अक्सर खुद पर ज़ुल्म करते हैं या जिसके लिए हम खुद को बदलना चाहते हैं, उन्हें ही चोट पहुँचाने लगते हैं. ये चोट शारीरिक कम मगर मानसिक ज्यादा होती है. जैसे कि अगर हमें किसी को अपनी ओर आकर्षित करना करना होता है तो अचानक ही उससे दूर रहने लगते हैं और उसे avoid करने लगते हैं. अगर जिसे हम avoid कर रहे हैं वो हमारा अच्छा मित्र हो और उसे हम अपने और करीब पाना चाहते हों तो विशेषज्ञों के अनुसार 80 % chances होते हैं कि वह हमारे और करीब आने की कोशिश करने लगता है. ये इसलिए होता है क्योंकि इन्सान की फितरत है कि अगर उसे जिस काम को करने के लिए मना किया जाये, तो वह वो कम जरूर करने कि कम से कम 1 बार कोशिश जरूर करेगा. बस इसी सिद्धांत के कारण अक्सर लोग एक - दूसरे के करीब आ जाते हैं.
          पर ये उपाय हमेशा काम आये ये जरूरी नहीं, क्योंकि कभी - कभी ऐसा नहीं भी होता.पर जब हम खुद को बदलते हैं ताकि हमे देख के कोई अपना भी हमारे लिए खुद को बदलने लगे, तब हम अपनी सोच में बदलाव ला कर अपना स्वाभाव तो बदल लेते हैं, पर जिसके लिए हमने ये बदलाव लाया है वो हमारे इस बदलाव से नहीं बदला और हमारी सोच के विपरीत ही रहा तो हमारी मेहनत धरी की धरी रह जाती है. और तब कहीं हमें ये न कहना पड़ जाए - 
                                              मैं बदल गया तुझे बदलने के लिए,
                                              तुझमे अपनी दोस्ती का रंग भरने के लिए...
                                                       पर जाने किस ग़लतफ़हमी ने तुझमे, ऐसा ज़हर है भर दिया,
                                                        के तू है निकल पड़ा मेरी ही जान लेने के लिए...
        बस इन्ही पंक्तियों को अगर हमें अपने मुख से न निकलना हो, तो हमें अपने अन्दर हमारी ही मर्जी से आये बदलाव को पूरी तरह से स्वीकारना होगा. इस बदलाव को अब ठुकराना बहुत गलती होगी क्योंकि विरोध हर जगह कारगर नहीं होता. अपने अन्दर आए बदलाव का हमेशा स्वागत करें और खासतौर पर उस बदलाव का, जो कभी आपकी अपनी चाहत में शामिल था. और ज़िन्दगी हर कदम बदलती है, इसलिए ज़िन्दगी के (समय के) बदलाव को भी स्वीकारना सीखें. क्योंकि बदलाव ही ज़िन्दगी है, यही समय है, यही प्रकृति है... 

महेश बारमाटे
7th April 2008