Tuesday, 28 June 2011

बेवफा...

"एकता, जो कल तक आकाश के साथ अक्सर दिखाई देती थी, आज तन्हाइयों ने उसे कुछ इस तरह घेर लिया है की दोस्तों की महफ़िल में भी वो अकेली दिखाई देती है. आज वो सच में बहुत अकेली और उदास हो गयी है. कारण है - आकाश की अचानक हुई सड़क दुर्घटना में मौत... एकता और आकाश एक दुसरे को बहुत चाहते थे, एक दुसरे की खातिर जान तक देने को तैयार थे वो दोनों... उन्होंने ने भी प्यार में संग जीने मरने की कसमे खायी थी, मगर होनी को आखिर कौन टाल सकता है ? आज एकता पूरी तरह से टूट चुकी है, लगता है जैसे किसी फूलदार डाली के सारे फूल हवा के एक हल्के से झोंके ने पल भर में ही बिखेर दिए हों. 


कल तक एकता को आकाश पर बहुत नाज़ था, क्योंकि एक हिन्दुस्तानी लड़की को जिस तरह के आदर्श लड़के (जीवन साथी के रूप में) जरूरत होती है, वह सब कुछ आकाश में था. न किसी तरह का ऐब और प्यार के अलावा किसी और तरह का नशा. दोनों की जोड़ी भी आदर्श जोड़ी ही लगती थी. पर ये समय........,  न कभी किसी का हुआ है और न ही कभी किसी और का हो पायेगा..."

-- कुछ ऐसे ही जज़्बात बयाँ कर रहीं थी, आज अनीता की आँखे, मयूर की तरफ देख कर. 
यूर, अनीता का बेस्ट फ्रेंड और एकता की बेस्ट फ्रेंड है अनीता. तीनो की जोड़ी अक्सर कॉलेज में हर कार्य में सबसे पहले दिखाई देती थी. पर आज जब भी मयूर और अनीता, एकता की ओर देखते तो उनका मन भी एकता के दुःख में रो पड़ता. मयूर से एकता का दुःख नहीं देखा जाता था, उसे हरदम यही लगता था कि एकता की दुनिया में फिर रंग भरने चाहिए, उसे फिर हँसता गाता देखे जैसे ज़माना हो गया हो. और फिर मयूर कॉलेज के पहले ही दिन से एकता को पसंद करने लगा था, पर वो अपने प्यार का इज़हार कभी नहीं कर सका क्योंकि जब उसने तय किया था कि वह उससे अपने प्यार का इज़हार करेगा उसी दिन उसे एकता के मुंह से ही आकाश का नाम सुन लिया. ये बात उसे जब पता चला तब से उसने एकता को हरदम खुश रखने की ठानी और वो भी बिना किसी शर्त के. 
ज जब एकता के पास आकाश का साथ नहीं रहा, तब भी उसने ये कभी नहीं छह की अपने प्यार का इज़हार करे  क्योंकि उसका प्यार दुनिया की सोच से ऊपर था, वो नही चाहता था कि कल को कोई पीठ पीछे ये कहे कि मयूर ने मौके का फायदा उठाया या मयूर ने एकता पर दया की और उसे अपना लिया. और फिर एकता का मानसिक स्तर भी इतना कमज़ोर हो चूका था कि ऐसे वक्त उसे क्या सही क्या गलत ये भी समझ में नहीं आ रहा था. वो अपने प्यार को साबित करना चाहता था, उसके लिए प्यार को पाना ही सब कुछ नहीं था, उसके लिए प्यार का मतलब था कि चाहे किसी भी रूप में सही, मगर वो एकता के दिल में अपनी जगह बनाना चाहता था. और मयूर को तो इतना भी आत्मविश्वास न था कि अगर एकता ने उसके प्रेम प्रस्ताव को अस्वीकार कर लिया तब वह क्या करेगा ? यही सब सोच कर वह चुप रहा और एकता की ज़िन्दगी में फिर से उम्मीद जगाने की कोशिश करने लगा...

यूर और अनीता दोनों ही चाहते थे कि एकता की ज़िन्दगी में आकाश की ही तरह फिर कोई ऐसा आये जो उसकी दुनिया को फिर खुशियों से भर दे. बस इसी इंतज़ार में करीब तीन महीने गुज़र गए. 

रंजीत, जो कि न तो स्वभाव से अच्छा था और न ही उसमे कोई अच्छी आदत थी. सिगरेट, दारू इत्यादि के नशे के बगैर उसका न तो दिन गुजरता था और न ही रात शुरू होती थी. इतने ऐब के बावजूद जब रंजीत ने एकता से अपने प्यार का इज़हार किया तो न जाने क्यों एकता उसके प्यार को मन न कर सकी. इस बात को करीब एक सप्ताह गुजरने के बाद जब यह बात मयूर को कक्षा के दुसरे छात्रों से मालूम हुई तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि एक समय था जब एकता, रंजीत के नाम से भी चिढती थी. वह उसे बिलकुल भी पसंद नहीं करती थी. तो फिर आखिर कैसे उसने "हाँ" कहा ? ये बात मयूर को हरदम मन ही मन बहुत सताती थी, और इसी सवाल के जवाब की खातिर उसने सारी छान-बीन भी शुरू कर दी. 

रंजीत और एकता के बीच बढती नजदीकियों ने अनीता और मयूर को एकता से दूर कर दिया. अब बस एकता और रंजीत ही एक साथ दिखाई देते थे और सारे दोस्त अलग. मयूर को एकता से दूर होने का गम न था पर रंजीत के प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना उसे बिलकुल पसंद न आया. 

ज आकाश की मौत को पूरा का पूरा एक साल गुजर गया. कॉलेज में उसकी मौत को एक साल बीतने पे पूरे कॉलेज में दो मिनट का मौन रख कर उसकी आत्मा को श्रद्धांजलि दी जा रही है. पर आज एकता कॉलेज नहीं आई और न ही रंजीत. आज दोनों रंजीत का जन्मदिन मनाने के लिए लॉन्ग ड्राइव पे गए हुए हैं. वे वहाँ खुशियाँ मना रहे हैं और यहाँ सारा कॉलेज और आकाश के परिजन आकाश को श्रद्धांजलि दे रहे हैं... इस दुःख के मौके पर सभी ने एकता को बहुत याद किया कि अगर वो होती तो आकाश की आत्मा को शान्ति देने में ज्यादा मदद मिलती. पर अगर आकाश की आत्मा एकता और रंजीत को देख रही होगी तो न जाने क्या सोच रही होगी.

जैसे - तैसे यह दिन भी गुजर गया. और अगले दिन सारे दोस्त फिर एक बार कॉलेज में मिलते हैं. आज एकता के लबों पे अजीब सी मुस्कान थी. और वो दूर से ही रंजीत की तरफ देख देख के मुस्कुराये जा रही थी. इसी बात पे अनीता ने आखिर एकता से पूछ ही लिया कि आखिर बात क्या है ? बहुत मना करने के बाद एकता ने बताया कि बीती रात उसने खुद को रंजीत को पूरी तरह से सौंप दिया था और वो मस्ती का आलम अब भी उसे मज़े दे रहा है. 
धर मयूर को लड़कों के समूह से पता चला कि बीती रात एकता और रंजीत के बीच क्या क्या हुआ था. इन बातों ने मयूर का दिमाग पूरी तरह से ख़राब कर दिया था. और फिर वो कॉलेज से घर की ओर जाने लगा... कॉलेज के साइकिल स्टैंड तक जाने से पूर्व ही वो अनीता और एकता से जा टकराया. पर एकता को देखते ही उसको न जाने क्यों पहली बार बहुत गुस्सा आया और उसकी ओर देख के उसने बिना कुछ कहे ही वहाँ से चला गया है पर उसकी आँखों ने उस वक्त जो कुछ कहा उससे एकता थोड़ी सी आश्चर्यचकित और परेशान भी हुई. तब अनीता ने एकता को इशारे से कहा कि मैं देखती हूँ और वो मयूर की ओर दौड़ती हुई चली गई.

अनीता ने मयूर की ओर आवाज लगते हुए कहा - 
"मयूर, मयूर... 
अरे सुन तो... !
क्या हुआ तुझे ?
कहाँ जा रहा है ?"

इतना कहते कहते वो मयूर के करीब पहुँच गई. तब मयूर ने पीछे मुड़कर उससे कहा -
"कुछ नहीं हुआ मुझे... आखिर मुझे क्या होगा ?"

"अरे ! तो फिर तू ऐसे ही क्यों आ गया बिना कुछ बोले ?"

"जैसे तुम कुछ भी नहीं जानती"

"मैं क्या... ? मैं क्या जानती हूँ ?"

"तू अब मेरा मुंह मत खुलवा... एक तो गलती करते हैं और फिर ख़ुशी में ढिंढोरा पीटते हैं कि हमने क्या गलती की है..." 

"तू क्या बोल रहा है ? मुझे कुछ नहीं समझ में आ रहा"

"अरे ! वो एकता... "

"एकता ? क्या किया एकता ने ?"

"अनीता देख सारा कॉलेज जानता है की उसने कल क्या किया, और तू भी अच्छी तरह से जानती है ये"

"हाँ ! तो क्या बुरा किया उसने ?"

"हा हा हा..! आखिर तुमने वो बात साबित कर ही दी, जिसपे मैं बिलकुल विश्वास नहीं करना चाहता था.."

कौन सी बात, मयूर ?

यही कि आखिर क्यों एकता ने रंजीत को अपनाया ? क्योंकि उसे गम था कि उसे आकाश वो नहीं मिला जो कल उसे रंजीत से मिल गया. इसीलिए वो तीन - चार महीनो तक दुखी थी कि अब उसे प्यार कौन करेगा... आखिर वो भी उन आम लड़कियों की तरह ही निकली जो किसी का इंतजार नहीं कर सकती. अरे ! अगर ऐसा ही था तो उस बेचारे आकाश को क्यों इतने दिनों तक वो बेवकूफ बनती रही ?"

"य.. य.. ये तुम क्या .. कह रहे हो ? आखिर ये सब तुमको किसने बोला ?"

"ये सब मुझे एकता की डायरी से पता चला, गलती से एक दिन वो कॉलेज में अपनी डायरी ले आई थी और उस दिन भूल गई थी पर मुझे मिल गई थी तो मैंने रख ली ताकि अगले दिन उसको लौटा सकूँ. बहुत रोका खुद को उसकी डायरी पढने से, पर खुद को रोक न पाया. ये सब पढने के बाद मैंने तय किया था की ये बात तुमको भी नहीं बताऊंगा.... अरे ! मैं तो वो सारी बातें भी भूल गया था क्योंकि मैं एकता से प्यार... 
पर तुमने... तुमने वो सारी बातें याद दिला दी... "

"म.. म... मयूर... तुम सच कह रहे हो ? मुझे विश्वास नहीं हो रहा..."

"हाँ ! सच कह रहा हूँ. यकीन न हो तो एकता से पूछ लो और फिर भी यकीन न हो तो जाओ आकाश के घर और उसकी छोटी बहन से आकाश की डायरी मांगना. आकाश अपने दिल की हर बात डायरी में लिखता था और अपनी छोटी बहन से हमेशा कहता था कि एकता कभी उसकी भाभी नहीं बन पायेगी. उसकी मौत के बाद उसकी बहन ने पूरी डायरी पढ़ी और उसमे पता है लास्ट पेज में क्या लिखा था आकाश ने ? "

"क.. क.. क्या ?"

"उसने लिखा था कि  - 

आज जा रहा हूँ के शायद फिर मुलाकात का वादा न कर पाउँगा...
के मुझे पता है कि तू बेवफा है, पर जीते जी मैं तुझे कभी बेवफा न कह पाउँगा... "


महेश बारमाटे "माही"
२८ जून २०११ 

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Sunday, 26 June 2011

ब्लॉग - माही की पचासवीं पोस्ट

आज मैं अपने कविताओं भरे ब्लॉग - माही की पचासवीं पोस्ट तथा उसके नए स्वनिर्मित संस्करण की खुशियाँ बांटने आया हूँ... 
आज बड़े दिनों बाद मैंने अपने ब्लॉग माही में कोई कविता पोस्ट की है... क्योंकि पिछले कुछ दिनों से मैं थोडा व्यस्त चल रहा था... फिर जब फुर्सत मिली तो पाया कि माही ब्लॉग में 49 पोस्ट हो चुकी हैं तो सोचा कि इस ब्लॉग को एक नया रूप दिया जाए, तो बस इसी कार्य में लग गया. फोटोशॉप सॉफ्टवेयर जिसे मैंने कभी छुआ भी न था, इस काम के लिए न केवल उसे छुआ बल्कि सफलता भी पायी. पर इस काम में मुझे 5 दिन लग गए, क्योंकि फोटोशॉप और Artisteer सॉफ्टवेयर को चलने का पहला अनुभव थोड़ा कठिन ही था. सब काम हो जाने के बाद सोचा कि एक अच्छी सी कविता भी लिखी जाए, पर दिल से रहा ही न गया कि कोई नयी कविता लिखी जाए तो बस अपनी डायरी उठाई और अपने दोस्तों को समर्पित एक कविता "वो गए... दिल गया..." पे नज़र जाते ही इसे लिखने का मन किया सो मैंने आपके समक्ष पेश कर दी अपनी कविता.
इस कविता का एक और महत्त्व है, क्योंकि जब ये कविता मुझे मेरे कॉलेज फ्रेंड्स की याद दिलाती है. वे सारे मेरे लिए बहुत ही ख़ास हैं, क्योंकि उनमे ऐसे बहुत से दोस्त हैं जिनके प्रोत्साहन के फलस्वरूप आज मैं इस ब्लॉग जगत में आपके समक्ष खड़ा हूँ, वरना हिंदी साहित्य के प्रति मेरी रूचि "न के बराबर तो नहीं पर कम जरूर थी"
आज जब भी कोई नई कविता या लेख लिखता हूँ तो बस सबसे पहले मेरे कॉलेज फ्रेंड्स याद आते हैं क्योंकि मेरी हर कविता उनके द्वारा जरूर पढ़ी जाती थी... आज वे सब मुझसे दूर हैं पर सच कहूँ तो आज भी वे लोग मेरे ख्वाबों में आते हैं. उनकी कमी आज मुझे बहुत खलती है... 
अब तो बस यही दुआ है कि काश ! मेरा ये लेख और मेरी 50वीं कविता वे जहां भी हों जरूर पढ़ें... 
के उनकी यादों ने मुझे आज भी महफूज़ रक्खा है "माही",
वरना वक्त के थपेड़ों ने मुझे कब का गिरा दिया होता...
आज मैं अपने सारे कॉलेज फ्रेंड्स (खासकर कुछ चुनिन्दा लोग जो मेरी हर कविता को अपने होंठों से छुआ करते थे) और मेरे स्कूल फ्रेंड्स और आप सभी का शुक्रगुजार हूँ कि आपकी दुआ और प्रोत्साहन के बल पर ही मैंने ये मुकाम पाया है...

धन्यवाद दोस्तों !

मैं आज भी तुम सभी को याद करता हूँ, गर फुरसत मिले तो मेरी यादों को भी समय दे देना.

तुम्हारा माही 

Friday, 24 June 2011

Facebook पे Group Chat : एक मजेदार अनुभव

      कुछ दिनों पहले मेरे सारे दोस्त, काम की तलाश में बहार चले गए, चूंकि मेरे ख़ास दोस्तों की संख्या  बहुत कम है इसीलिए उनकी कमी बहुत खलती है आज मुझे. मेरे कुछ ही दोस्त हैं जिनमे से ख़ास तो बस तीन - चार ही हैं जिनसे मैं अपने दिल की सारी बातें शेयर करता हूँ.. और आज जब वो लोग यहाँ नहीं है तो थोड़ा सूनापन सा लगता है. ये वो दोस्त हैं जो बचपन से ही मेरे साथ हैं पर पिछले कुछ महीनो में हम इतने करीब आ गए थे कि दूर होना, ख्वाब में भी डराता था. भगवान न करे की आप में से किसी का भी ख़ास दोस्त आपसे जुदा हो. 
         चूंकि वो लोग अपने काम के सिलसिले में वहाँ गए हैं तो मैं उनको कभी बिना सफलता के वापिस आने नहीं कहूँगा. मेरे लिए उनकी दोस्ती से ज्यादा उनके जीवन की सफलता है. और मैं चाहूँगा कि वे अपना हर ख्वाब जीयें उसे पूरा करें और हर वो ख़ुशी पायें जो उन्हें मिलनी चाहिए. 
        आज वो मुझसे दूर हैं पर मोबाइल ने हमको साथ जोड़े हुए है. पर कभी कभी आर्थिक हालातों के चलते मोबाइल भी इन दूरियों को कभी कभी कम नहीं कर पाता. फिर ख्याल आता है इन्टरनेट का और इन्टरनेट अगर साथ है तो फेसबुक का ख्याल आना तो जरूरी ही है. कल २२ जून २०११ को, हम तीन दोस्त मनजीत (जो कि अभी दिल्ली में है), सौरभ (जो कि अभी पुणे में है) और मैं यानि महेश (जबलपुर से) फेसबुक पे इत्तिफाकन एक ही समय पे ऑनलाइन हुए. अब तीनो को एक दुसरे से बहुत सारी बातें भी करनी थी क्योंकि करीब एक महीने से हमने एक साथ बात भी नहीं की थी. तो फिर सोचा कि क्यों न कुछ ऐसा किया जाए जिससे कि तीनो एक साथ चैट के माध्यम से बात कर सकें. और उसमे ऐसा कुछ हो जिससे तीनो को एक दूसरे की कही बात चैट बॉक्स पे दिखाई भी दे. बस फिर क्या था ? मेरा थोड़ा सा दिमाग चला और मैंने हम ख़ास दोस्तों के पहले से बने फेसबुक ग्रुप पे जैसे ही क्लिक किया वैसे ही नीचे फेसबुक चैट बॉक्स के बगल में हमारे ग्रुप का भी चैट बॉक्स आ गया और हम तीनो टैली - कॉन्फ्रेंसिंग (Tele - Conferencing) की तरह आपस में बात करने लगे. 
        मारे बीच करीब १.३० घंटे की बातचीत हुई. ऐसा लगा जैसे कि हम लोग आसपास ही हों और बतिया रहे हों.ये मेरा अब तक का सबसे यादगार और मजेदार अनुभव था, हमारे बीच कुछ ऐसी मजाक भरी बातें हुई कि हम करीब २० मिनट तक अपनी हंसी को रोक नहीं पाए. पर इस बीच हमने हमारे एक और दोस्त अजय (जो की अभी गुडगाँव में है) को बहुत याद किया, उसके पास इन्टरनेट की सुविधा न होने के कारण वो चाट पे आ न सका. ये ९० मिनट हमारी जिंदगी के बहुत खूबसूरत पलों में से एक थे, तभी मैंने सोचा क्यों न ये अनुभव सबके साथ बांटा जाए और उन लोगों जो हमारी तरह अपनों से दूर हैं पर फेसबुक के जरिये आपस में बात कर सकते हैं, को एक साथ ग्रुप चैट करना सिखाया जाए ताकि वे अपने उन अनमोल पलों को अपनी स्मृति में संजो कर रख सकें. 
        चूंकि आज फेसबुक के इतने सारे प्रयोक्ता हैं कि लगभग सभी को ग्रुप चैट के बारे में पता ही होगा पर फिर भी मैं आपको ये जानकारी इसीलिए देना चाहता हूँ क्योंकि आज भी भारत में फेसबुक का प्रयोग करने वाले इसकी सारी सुविधाओं के बारे में अच्छे से नहीं जानते. 
तो फिर चलिए शुरू किया जाए - 
  • सबसे पहले तो आप अपने फेसबुक अकाउंट पे लॉगिन करें.
  • फिर अपने फेसबुक पेज के बांयी तरफ देखें कुछ इस तरह की एक लिस्ट दिखेगी.  
  • अब Create Group पे क्लिक करें.
  • आपको एक नया पॉपअप विंडो दिखाई देगा. जिसमे अपने ग्रुप का नाम, तथा ग्रुप के सदस्यों के नाम लिखें. सदस्यों के नाम लिखते साथ ही फेसबुक आपको सलाह के रूप में आपके फेसबुक फ्रेंड्स के नाम दिखने लगता है. जैसे ही आप ग्रुप के सदस्यों के नाम लिख लें. आप ग्रुप प्राइवेसी पे क्लिक कर के ग्रुप का प्रकार तय कर सकते हैं. 

  • ग्रुप प्राइवेसी तीन विकल्प हैं - 
  1. Open - अगर आप चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति इस ग्रुप को बिना आपकी इजाजत के ज्वाइन कर सके.
  2. Closed - अगर आप चाहते हैं कि आपकी मर्जी के बिना कोई भी इस ग्रुप में शामिल न हो.
  3. Secret - अगर आप अपने ग्रुप को गुप्त रखना चाहते हैं तो इस पर क्लिक करें. 
  • इसके बाद आप Create button पे क्लिक कर के अपना ग्रुप बना लीजिये.
  • लो जी आपका ग्रुप बन गया, अब आप चाहें तो अपने ग्रुप के सदस्यों से ग्रुप चैट कर सकते हैं. उसके लिए बस अपने ग्रुप के पेज को बायीं तरफ दी गयी लिस्ट में क्लिक करें और फिर नीचे दायीं ओर देखें जहाँ चैट बॉक्स होता है, वहाँ आपको आपके ग्रुप का एक अलग से चैट बॉक्स मिलेगा. बस उसपे क्लिक कर के शुरू हो जाइये अपनों के संग एक निजी चैटिंग के लिए...

  • और हाँ, एक बात का जरूर ध्यान दें कि अगर आप खुद अपने फेसबुक के चैट बॉक्स में ऑफलाइन होंगे तो ग्रुप चैट बॉक्स में भी कोई भी सदस्य नहीं दिखेगा, चाहे वो ऑनलाइन हो या न हो. इसीलिए अगर आप ऑनलाइन हों ओर आपको एक से अधिक दोस्तों से बात करनी हो तो ग्रुप चैट पे अपने दोस्तों को आमंत्रित करें ओर मजे लें ग्रुप चैट के.
चलते - चलते इस ग्रुप चैट की एक खामी मैं बताना चाहूँगा, वो ये कि अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को अपने ग्रुप में रखते हैं जिससे आप बात नहीं करना चाहते और जब आप किसी दोस्त से कोई निजी बात कर रहे होते हैं तब अगर वह व्यक्ति ऑनलाइन होगा तो वो आपकी सारी बातें पढ़ सकता है. इसके लिए बेहतर यही होगा कि अपने ख़ास ग्रुप को गुप्त या Secret ही रखा जाए...

आशा है कि आपको ये जानकारी पसंद आई होगी... 

- महेश बारमाटे "माही"

(यह लेख मेरे उन अभिन्न मित्रों के नाम मैं समर्पित कर रहा हूँ जो आज मुझसे दूर हैं पर दिल के बहुत ही करीब.)

# सारे चित्र fecebook व google से लिए गए हैं.. 

Tuesday, 21 June 2011

एक सोच, एक सुझाव और एक क्रांति

      जब से मैं इस ब्लॉग्गिंग की दुनिया में आया हूँ, तब से मैंने पाया है कि लगभग हर प्रदेश या शहर विशेष के चंद चिट्ठाकारों (Bloggers) ने मिल कर एक ब्लॉग असोसिएशन बना लिया या फिर किसी स्थान विशेष पर निश्चित समय पर पहुँच के एक छोटी सी संगोष्ठी या सम्मलेन का आयोजन कर डाला. सम्मलेन में कुछ लोगों को उनके हिंदी ब्लॉग्गिंग क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के लिए कुछ पुरुस्कार भी दिए गए और फिर हिंदी ब्लॉग्गिंग के सुन्दर भविष्य पर थोड़ा चिंतन व मनन के पश्चात् उस समारोह का सारा सारांश समाचार के रूप में चित्रों समेत किसी ब्लॉग विशेष पे सजा दिया जाता है. 
    डरिये मत, मैं ऐसे किसी भी समारोह या असोसिएशन के खिलाफ नहीं हूँ, बल्कि मैं यह बताना चाहता हूँ कि इस साहित्य जगत में एक शहर ऐसा भी है जहां से साहित्य के अनमोल हीरे निकले और उन्होंने हिंदी साहित्य को गगनचुम्बी ऊंचाइयों तक पहुँचाया. उनमे से कुछ अनमोल हीरों के नाम मैं लेना चाहूँगा - "श्री हरिशंकर परसाई जी, सुभद्रा कुमारी चौहान जी, द्वारका प्रसाद मिश्र जी, भवानी प्रसाद मिश्र जी ... " और न जाने कितने हीरों का शहर है ये...
अब शायद आप भी समझ गए होंगे कि मैं किस शहर की बात कर रहा हूँ ?
जी हाँ ! मैं जबलपुर शहर की बात ही कर रहा हूँ...

जबलपुर शहर ! आह ! 
     जिसका नाम लेते ही कभी पवित्र पावनी माँ नर्मदा के घाटों का रमणीय दृश्य जेहन में उतर आता है, तो कभी रानी दुर्गावती के बलिदान की गाथा आँखों के सामने घटित होने लगती है और तो कभी सुभद्रा कुमारी चौहान जी के स्वर "खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी" कानो में गूंजने लगते हैं, जो हर पल एक नया जोश भर देते हैं.
      और आपको शायद न मालूम हो पर एक बात जो कुछ महीने पहले ही मुझे पता चली थी वो ये कि राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी जी कि अस्थियाँ, जबलपुर में नर्मदा नदी के तिलवारा घाट में विसर्जित की गयी थी और उसी के बाद तिलवारा घाट के समीप ही गाँधी भवन का निर्माण किया गया. (यह बात मुझे मध्यप्रदेश टूरिज्म के फेसबुक पेज से प्राप्त हुई).

      आज मैं जान गया हूँ कि जबलपुर को उपेक्षा की दृष्टी से देखना खुद को उपेक्षित करना है. और जो इन्सान खुद की नज़रों से गिर जाए तो उसका कुछ भी नहीं हो सकता. 
       पिछले छः महीनो में मैंने जाना कि हिंदी ब्लॉग्गिंग जगत में जबलपुर भी अपनी साख बना रहा है, जिसमे से कुछ ब्लॉगर तो आज सारे ब्लॉग जगत में अच्छी तरह जाने जाते हैं. उनमे से एक हैं - श्री समीर लाल उर्फ़ उड़न तस्तरी जी... आज हर कोई उनको भली भांति जानता है.

       अब मुद्दे की बात की जाए तो ज्यादा बेहतर होगा. मैंने पाया कि साहित्य से जुड़े लगभग हर शहर में हिंदी ब्लॉगर सम्मलेन का आयोजन किया जाता या जा रहा है. पर आज तक मैंने जबलपुर में ऐसे किसी सम्मलेन का आयोजन नहीं देखा जहाँ विशेषतः जबलपुर के हिंदी चिट्ठाकारों को आमंत्रित किया गया हो और हिंदी ब्लॉग्गिंग के बेहतर भविष्य के लिए कोई चिंतन किया गया हो... शायद मैं गलत हो सकता हूँ क्योंकि ब्लॉग्गिंग के क्षेत्र में मैं अभी भी नया ही हूँ. 

        अतएव मैं सारे जबलपुर वासियों से ये अनुरोध करना चाहता हूँ कि एक ऐसी ही कोई नयी पहल की जाये जिसमे केवल जबलपुर शहर या मध्यप्रदेश के हिंदी ब्लॉग्गिंग जगत के दिग्गज व नवोदित ब्लॉगर शामिल हों.  क्योंकि जबलपुर का निवासी होने के नाते मैं चाहता हूँ कि ब्लॉग्गिंग जगत में बस एक दो ही हीरे जबलपुर से न हों बल्कि हम जबलपुरवासियों की वजह से सारे हिंदी ब्लॉग्गिंग जगत का आसमान चमक उठे..

       अगर आज आप में से किसी भी जबलपुरवासी का विचार ऐसी किसी संगोष्ठी के आयोजन करने का हो तो कृपया मेरे निम्न विचार या सुझावों को अपने विचारों में शामिल जरुर करें -
  1. पहला ये कि ये संगोष्ठी या सम्मलेन समारोह केवल जबलपुर में ही आयोजित किया जाए.
  2. अगर आपका विचार जबलपुर की प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने का हो तो बेहतर ये होगा कि सारे ब्लॉग जगत को पता चले कि जबलपुर में ऐसा कोई आयोजन हो रहा है.
  3. सम्मान प्रदान करने वाला शख्स कोई ब्लॉगर, या साहित्यकार ही हो कोई नेता या राजनीति से सम्बंधित व्यक्ति न हो क्योंकि साहित्यकारों और ब्लागरों के मन को केवल ब्लॉगर ही जान सकते हैं कोई नेता नहीं. 
  4. इस संगोष्ठी में उन साहित्यकारों को भी बुलाया जाए जो इन्टरनेट की पर्याप्त जानकारी न होने के कारण अपना ब्लॉग नहीं बना पते या उसे ज्यादा लोकप्रिय नहीं कर पाते. 
  5. अगर संगोष्ठी का आयोजन छोटे लेवल में भी करना चाह रहे हों तो भी कम से कम हिंदी ब्लॉग्गिंग जगत को सूचित करें ताकि सारे जबलपुरिया हिंदी ब्लॉगर ये जान सकें कि जबलपुर में अब भी वो जोश बाकी है जो अब इन्टरनेट पर छाने को तैयार है.

      और अगर मेरी बात से कोई भी ब्लॉगर या साहित्यकार सहमत न हो या कोई भी शंका हो या सुझाव हो तो कृपया मुझे बताएं...

        क्योंकि आज मैं इतना सक्षम नहीं कि ऐसा कोई आयोजन अकेले ही करा सकूँ. पर वादा है मेरा कि आज नहीं तो कल ऐसा कोई आयोजन जबलपुर में जरूर होगा जब भी मैं (आर्थिक रूप से) सक्षम हो जाऊँगा. 

और अंत में...

मत छुपा खुद को अंधियारे में माही
के सारा जहां तेरी चमक देखने को बेकरार बैठा है...
तुझे भी पता है कि चमक से तेरी चमक उठेगा आसमां का हर तारा
अब तू ही बता के ये बेवजह इंतज़ार कैसा है ?

- महेश बारमाटे "माही"

ताकि "हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड" इतिहास न बन जाये...

नमस्कार दोस्तों !

आज बड़े लम्बे समयांतराल के बाद मुझे फुरसत मिली. किसी व्यक्तिगत कार्य में व्यस्त होने के कारण आज तक मैंने अपनी ब्लॉग्गिंग को तरसती उँगलियों को न जाने किस तरह रोक के रखा था, ये या तो मैं जानता हूँ या आप (क्योंकि आप भी तो एक ब्लॉगर ही हैं, और ब्लॉगर ही ब्लॉगर का दर्द जान सकता है). वैसे आज मैंने अपनी व्यस्तता से थोड़ा सा समय चुरा ही लिया और आपके समक्ष हाज़िर हो गया. चलिए अब काम की बात की जाये.
पिछले महीने मैंने अपने एक लेख में सभी से आह्वान किया था ताकि सारे ब्लॉगरगण हमारी मदद करें - हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड हेतू और आप सभी के स्नेह से हमें बहुत से लोगों के कमेंट्स व ईमेल मिले जो कि "हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड" के लिए अपना योगदान देना चाहते थे. मैं उन सभी ब्लॉगरगण का तहे-दिल से आभारी हूँ कि उन्होंने मेरे एक आह्वान पे दौड़े चले आये और आशा करता हूँ कि इसी तरह मुझे आप सभी का स्नेह व सहयोग मिलता रहेगा.
आज करीब पच्चीस दिन हो गए होंगे मेरे उस लेख को और सभी ब्लॉगरगणों को विषय दे दिए गए थे ताकि वे हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड के निर्माण में जल्द से जल्द सहयोग कर के इसके कार्य को अगले चरण तक पहुंचाएं. मुझे उम्मीद है कि लगभग सभी ने अपना कार्य बखूबी पूरा कर लिया होगा, पर जैसा कि मुझे ज्ञात है, अभी तक किसी ने भी अपने कार्य पूर्ण होने का प्रमाण नहीं दिया है.
अब आप लोग ये सोच रहे होंगे कि मैं खुद उन लोगो को नाम से संबोधित करके यह क्यों नहीं पूछ लेता कि हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड के सन्दर्भ में उनका कार्य कहाँ तक पहुंचा है ?
तो इसका भी मेरे पास जवाब है कि अभी तक किसी भी ब्लॉगर ने अपने कार्य शुरू करने के बारे में हमें कोई भी जानकारी नहीं दी है और जिन्होंने दी है उनके बारे में मुझे स्पष्ट रूप से कोई जानकारी नहीं है. पर जैसा कि मैंने पहले कहा था कि जैसे ही मुझे सारे ब्लॉगर के नाम मालूम हो जायेंगे मैं उन नामों को सार्वजनिक कर दूंगा. 
अब आप लोगों से फिर एक बार विनती है कि आप हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड के सन्दर्भ में अपने योगदान की जानकारी हमें ईमेल, मोबाइल सन्देश या टिप्पणी के जरिये प्रदान करें. ताकि हिंदी ब्लॉग्गिंग की पहली सम्पूर्ण गाइड का इंतजार बस इंतजार बन के न रह जाये...

आपके जवाब के इंतजार में... 

महेश बारमाटे "माही"

मेरे पिछले लेख जिनमे मैंने हिंदी ब्लॉग्गिंग गाइड के लिए सबसे आह्वान किया था उनके लिंक हैं -
http://hbfint.blogspot.com/2011/05/blog-post_5220.html
http://meri-mahfil.blogspot.com/2011/05/blog-post_23.html
http://hbfint.blogspot.com/2011/05/blog-post_5834.html

Saturday, 11 June 2011

ख़ुशी की बात

नमस्कार दोस्तों ! 

आज मन बहुत खुश भी है और उदास भी... 
वैसे अपनी उदासी के बारे में आज कुछ भी न कहूँगा, और शायद कभी नहीं कहूँगा क्योंकि जितना मैं उसके बारे में सोचूँगा उतना ही उदासियाँ मुझे घेरते जाएँगी...
तो चलो आज ख़ुशी की बात ही हो जाए...

ख़ुशी की बात ये है कि आज मैंने ज़िन्दगी में पहली बार कोई नाटक (play) देखा, देख के मन बहुत प्रसन्न हुआ. आज हमारे शहर जबलपुर में एक नाट्य मंच की ओर से एक नाटक "सवाल और स्वप्न" का मंचन किया गया. और ख़ुशी इस बात की हुई कि सारे कलाकार युवा थे तथा उस नाटक का निर्देशक भी एक २४ - २५ साल के नवयुवक "संदीप जी" ने किया है. थोड़ी छानबीन करने के बाद पता चला कि वे नाट्य कला के साथ - साथ लेखन में भी रूचि रखते हैं, पर समयाभाव के कारण हमारी ज्यादा बात ही न हो सकी, पर इतना जरूर विश्वास है मुझे कि हम फिर मिलेंगे और इस विषय पर लम्बी चर्चा भी करेंगे. अब बात की जाए नाटक की पृष्ठभूमि की, तो यह नाटक पारिवारिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया है और इसे श्री कृष्ण बलदेव वैद जी ने लिखा है... इस नाटक के कुछ अंश आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं.. -


मुझे ख़ुशी इस बात की ज्यादा है कि इस नाटक के निर्देशन से लेकर मंचन तक का सारा काम केवल युवा कलाकारों के हाथ ही था. और इस नाटक को देखने आये लोगों में युवा वर्ग का ज्यादा योगदान रहा. 
चूंकि मुझे ख़ुशी इस बात की इसीलिए है क्योंकि आज भारत का अधिकांश युवा वर्ग या तो साहित्य की ओर कोई ध्यान नहीं देता और या तो केवल अंग्रेजी साहित्य की ओर ही ध्यान देता है. ऐसा मेरा मानना है. पर अब मेरी ये मान्यता कुछ हद तक झुठलाती सी नज़र आ रही है...

चलो अब एक और खुशखबर और सुना देता हूँ. 

वो यह कि मेरे ब्लॉग "माही" की अगली पोस्ट पचासवीं पोस्ट होगी. 
यह ब्लॉग मैंने २७ दिसंबर २००९ को लिखना शुरू किया था 
जिसमे अब तक मुझे 176 कमेंट्स और 13 + 9(networkedblogs.com के द्वारा) फौलोवर मिले हैं...

चूंकि ये कोई बड़ी उपलब्धि न हो किसी के लिए पर मेरे जैसे नए ब्लॉगर के लिए ये उपलब्धि से कम नहीं...
अब तलाश रहा हूँ एक सही समय अपनी पचासवीं पोस्ट के लिए, जिसे मैं अपने ब्लॉग "माही" के नए रूप के साथ पेश करूँगा...
मेरे सहयोग व आप सभी के प्रोत्साहन के लिए मैं तहे - दिल से आप सभी को शुक्रिया कहना चाहता हूँ.

और अंत में बस अब तो यही कहना चाहूँगा मैं कि 


ले चल खुले आसमान की ओर मुझे ऐ माही 
के फलक पे नाम अपना लिखना है...
ज़मीन पे रह कर खूब निहारा है कल तक आसमान को हमने,
अब तो बस फलक पे खुद को चाँद की तरह देखना है... 

धन्यवाद

महेश बारमाटे "माही"
१० जुलाई २०११