Sunday, 22 July 2018

सब्जी क्या बनाऊँ : एक राष्ट्रीय समस्या (व्यंग्य)

 हमारे भारत में राष्ट्रीय तौर पर उभर रही है एक समस्या, जिससे समस्त गृहणियाँ और साथ में बेचारे पति भी परेशान रहते हैं, उससे न जाने कितने परिवारों में दिन में न जाने कितनी बार मनमुटाव, लड़ाई झगड़ा और यहाँ तक कि मार पीट की भी नौबत आ जाती है, उस समस्या का नाम है - " सब्जी क्या बनाऊँ?"

जी हाँ! इस समस्या से मेरे हिसाब से लगभग हर पति परेशान हुआ जरूर होगा। वैसे तो ये समस्या केवल गृहणियों की ही है पर इसके साइड इफ़ेक्ट तो सबसे ज्यादा पतियों को ही झेलने पड़ते हैं। और ये समस्या अक्सर शाम के वक़्त ही देखने को मिलती है, क्योंकि हमारे देश के सर्वाधिक पति जब भी काम से घर लौटते हैं, उनसे ये बात जरूर पूछी जाती है, कि सब्जी क्या बनाऊँ? अब ऐसे में बेचारा पति जो ऑफिस से बॉस की खरीखोटी सुन के आया हो, किसी उपभोक्ता से या अपने क्लाइंट से अपनी कंपनी या विभाग की गलत नीतियों को सही साबित करने के चक्कर में ही कुछ जबरदस्त टाइप की बहस कर के आया हो, उसके दिमाग मे अब भी उसी बॉस, क्लाइंट या उपभोक्ता की बातें घूम रही हों, तो भी वो खुद को नॉर्मल सा दिखाने के चक्कर में मन को शांत कर रहा हो, तभी उनकी प्रिय पत्नी जी ने उनके सामने एक सवाल रख दिया हो, "सब्जी क्या बनाऊँ..?" तो घर में तांडव होना जरूरी सा प्रतीत होता है। सच कहूँ, उस समय तो ऐसा लगता है जैसे कंप्यूटर पे जरूरी फ़ाइल ईमेल से डाऊनलोड हो रही हो और किसी ने अचानक से कंप्यूटर का रिसेट बटन दबा दिया हो, फिर तो बेचारे पति देव के दिमाग में कुछ भी नहीं बचता। तब या तो लड़ाई की स्थिति निर्मित हो ही जाती है या फिर पतिदेव अपने कंप्यूटर दिमाग में खोजते हैं कि पिछली दफा जब किचन में घुसे थे तो उन्होंने फ्रिज में क्या क्या सब्जी देखी थी जो बनाई जा सकती है। और इस प्रक्रिया में पतिदेव का कंप्यूटर दिमाग ये गणना करने लगता है कि यार, किचन में घुस कर फ्रिज में देखने का ये सौभाग्य आखिर कब पाया था उन्होंने। क्योंकि हिंदुस्तान में अक्सर पतियों को सदियां गुजर जाती हैं पर किचन के अंदर उनके पद नहीं पड़ते हैं। फिर आनन फानन में उनके मुँह से बस यही निकलता है कि यार! तुमको जो पसंद हो वही बना दो। 

ऐसे में भारतीय पत्नी जो कि अपने पति की सेवा में लगी रहती है वो सोच में पड़ जाती है कि "यार! हमेशा तो अपने ही हिसाब से सब्जी बनाती हूँ, और आज कुछ अलग बनाने का मूड हुआ तो जनाब ने बोल दिया अपने हिसाब से ही देख लो, ये भी तो कह सकते थे कि चल रहने दे आज होटल से खाना खा के आते हैं, पर इनको तो बस मुझसे खाना बनवाना है, काम वाली बाई बना के रख दिया है।"

और फिर क्या, पत्नी जी थोड़ी नासमझ होंगी तो मनमुटाव इत्यादि की स्थिति बनेगी नहीं तो वो अपनी समझदारी का परिचय देते हुए, तुरंत लौकी या टिंडे की सब्जी बना देती है। जिसे खाने का मन, शायद ही किसी पतिदेव को होता होगा। अरे! मैंने तो एक बार फेसबुक में किसी महानुभाव के द्वारा शेयर की गई पेपर की कटिंग में पढ़ा था कि किसी जगह रोज रोज लगातार 7 दिन तक लौकी की सब्जी बनाने के आरोप में पतिदेव ने अपनी पत्नी के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज करवा दी। मेरे ख्याल से उस घर में भी यही समस्या सबसे ज्यादा रही होगी कि सब्जी क्या बनाऊँ..?

खैर! मैं तो थोड़ा खुशकिस्मत हूँ कि ये समस्या मेरे घर पे तो सिर नहीं उठा रही क्योंकि मेरी प्रिय पत्नी जी स्वयं सोच लेती हैं कि आज क्या बनाना है और क्या नहीं..? और ऊपर वाले की कृपा से हर छुट्टी वाले दिन स्वतः ही कुछ स्पेशल खाने का सौभाग्य हमको मिलता रहता है।

वैसे मेरा अपने देश के माननीय प्रशासन से अनुरोध है कि देश की राष्ट्रीय समस्याओं की सूची में "सब्जी क्या बनाऊँ..?" की समस्या को भी शामिल करते हुए संसद में इस सम्बन्ध में वार्तालाप, चिंतन वगैरह कुछ करना चाहिए, और कोई न कोई ठोस हल निकालना जरूर चाहिए, वरना एक दिन ऐसा आएगा कि जो भी पतिदेव मुझ जैसे सौभाग्यशाली नहीं होगा, वो तो भैया, टिंडे और लौकी पर ही अपनी ज़िंदगी काटने में मजबूर हो जाएगा। तो भाइयों इस विकराल समस्या को और विकराल होने से पहले ही ठोस हल की तलाश शुरू कर दीजिए, वरना नतीजा आपको स्वयं पता है।


- महेश बारमाटे "माही"

5 comments:

  1. सच में भारी समस्या है !

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  2. घर घर की समस्या 'सब्जी क्या बनाऊँ?'. बहुत मजेदार लिखा है.

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